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डॉलर निर्भरता में कमी और बदलती वैश्विक आर्थिक व्यवस्था (71st BPSC Essay)
“The difficulty lies not so much in developing new ideas as in escaping from old ones.” — John Maynard Keynes
एक समय था जब अंतरराष्ट्रीय व्यापार, निवेश और वित्तीय लेन-देन की कल्पना अमेरिकी डॉलर के बिना करना लगभग असंभव माना जाता था। तेल की कीमतों से लेकर केंद्रीय बैंकों के विदेशी मुद्रा भंडार तक, वैश्विक अर्थव्यवस्था में डॉलर की भूमिका अत्यंत प्रभावशाली रही है। लेकिन आज दुनिया की आर्थिक और राजनीतिक संरचना बदल रही है। उभरती अर्थव्यवस्थाओं का बढ़ता प्रभाव, भू-राजनीतिक तनाव, प्रतिबंधों का बढ़ता उपयोग, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों का विकास इस बात के संकेत हैं कि वैश्विक अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे अधिक बहुध्रुवीय मौद्रिक व्यवस्था की ओर बढ़ रही है।
इसी प्रक्रिया को सामान्यतः डी-डॉलराइजेशन (De-dollarization) कहा जाता है, अर्थात अंतरराष्ट्रीय व्यापार, विदेशी मुद्रा भंडार और वित्तीय लेन-देन में अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता को कम करना। हालांकि इसका अर्थ डॉलर का तत्काल अंत नहीं है। 2026 की पहली तिमाही में भी वैश्विक आधिकारिक विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर की हिस्सेदारी लगभग 57.13 प्रतिशत थी। इसलिए वर्तमान परिवर्तन को डॉलर के पतन के बजाय उसकी प्रभुत्वशाली स्थिति में धीरे-धीरे हो रहे विविधीकरण के रूप में समझना अधिक उचित है।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था में डॉलर को विशेष स्थान प्राप्त हुआ। ब्रेटन वुड्स व्यवस्था ने डॉलर को वैश्विक मौद्रिक प्रणाली का प्रमुख आधार बनाया। अमेरिकी अर्थव्यवस्था का विशाल आकार, गहरे पूंजी बाजार, राजनीतिक-संस्थागत स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में व्यापक स्वीकार्यता ने डॉलर को केवल अमेरिकी मुद्रा नहीं रहने दिया, बल्कि उसे वैश्विक वित्त की प्रमुख भाषा बना दिया।
लेकिन आज इस व्यवस्था पर कई दिशाओं से प्रश्न उठ रहे हैं। अमेरिका द्वारा वित्तीय प्रतिबंधों और डॉलर-आधारित वित्तीय तंत्र का विदेश नीति के साधन के रूप में उपयोग करने से कुछ देशों में वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों की खोज तेज हुई है। रूस, चीन, ईरान और कुछ अन्य देश स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने तथा डॉलर-आधारित वित्तीय ढाँचे पर निर्भरता कम करने की दिशा में प्रयास कर रहे हैं।
“Economic power is increasingly becoming more diffuse, and the international monetary system must reflect that reality.”
इस बदलते परिदृश्य में BRICS का महत्व विशेष रूप से बढ़ा है। इसके सदस्य देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, सीमा-पार भुगतान और वैकल्पिक वित्तीय तंत्र को लेकर चर्चा बढ़ी है। इसका उद्देश्य केवल किसी एक नई मुद्रा को डॉलर का स्थान देना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाना है जिसमें देशों के पास अंतरराष्ट्रीय लेन-देन के लिए अधिक विकल्प उपलब्ध हों।
यहीं इस पूरी प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण पक्ष सामने आता है—डॉलर से दूरी का अर्थ आवश्यक रूप से डॉलर का विकल्प चुनना नहीं है। कई देश रुपये, युआन, यूरो, दिरहम या अन्य मुद्राओं में द्विपक्षीय व्यापार बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। इससे अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था एक ऐसी संरचना की ओर बढ़ सकती है जिसमें अनेक मुद्राएँ अलग-अलग क्षेत्रों और व्यापारिक समूहों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँ।
इस परिवर्तन के पीछे भू-राजनीतिक कारण भी हैं। जब किसी देश के विदेशी मुद्रा भंडार या अंतरराष्ट्रीय व्यापार का बड़ा हिस्सा डॉलर में होता है, तो वह अमेरिकी वित्तीय व्यवस्था और उसकी नीतियों से प्रभावित होता है। प्रतिबंधों और वित्तीय प्रतिबंधात्मक उपायों ने कई देशों को यह सोचने के लिए प्रेरित किया है कि उनकी आर्थिक सुरक्षा के लिए वैकल्पिक भुगतान चैनल कितने आवश्यक हैं।
सोने की बढ़ती भूमिका भी इसी व्यापक परिवर्तन का संकेत देती है। कुछ केंद्रीय बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार में सोने का महत्व बढ़ा रहे हैं। हालाँकि सोना स्वयं अंतरराष्ट्रीय भुगतान की दैनिक मुद्रा नहीं है, लेकिन यह किसी एक देश की मौद्रिक नीति पर निर्भर नहीं होता। इसलिए इसे आर्थिक और भू-राजनीतिक अनिश्चितता के समय सुरक्षित परिसंपत्ति के रूप में देखा जाता है।
फिर भी डॉलर की स्थिति को कमजोर समझ लेना जल्दबाजी होगी। डॉलर की सबसे बड़ी ताकत केवल अमेरिकी अर्थव्यवस्था का आकार नहीं, बल्कि विश्वास, तरलता और वित्तीय बाजारों की गहराई है। अमेरिकी सरकारी प्रतिभूति बाजार दुनिया के सबसे बड़े और सबसे अधिक तरल बाजारों में से एक है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार, बैंकिंग और विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर की भूमिका अभी भी बहुत व्यापक है। इसलिए किसी दूसरी मुद्रा के लिए इतनी बड़ी व्यवस्था को तुरंत बदलना आसान नहीं है।
यही कारण है कि चीनी युआन के सामने भी कई सीमाएँ हैं। चीन वैश्विक व्यापार में एक बड़ी शक्ति है और युआन का अंतरराष्ट्रीय उपयोग बढ़ रहा है, लेकिन पूंजी नियंत्रण और मुद्रा की पूर्ण स्वतंत्र परिवर्तनीयता से जुड़े प्रश्न अभी भी मौजूद हैं। दूसरी ओर यूरो एक मजबूत अंतरराष्ट्रीय मुद्रा है, लेकिन यूरोपीय संघ के भीतर राजनीतिक और वित्तीय संरचना अमेरिकी प्रणाली से अलग है। इसीलिए निकट भविष्य में किसी एक मुद्रा द्वारा डॉलर को पूरी तरह प्रतिस्थापित करने की संभावना सीमित दिखाई देती है।
भारत के लिए यह बदलती आर्थिक व्यवस्था चुनौती और अवसर दोनों लेकर आती है। भारत को ऊर्जा, रक्षा उपकरण, प्रौद्योगिकी और विभिन्न कच्चे माल के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यापार करना पड़ता है। यदि कुछ साझेदार देशों के साथ रुपये में व्यापार बढ़ता है, तो डॉलर की मांग और मुद्रा विनिमय लागत को कुछ हद तक कम किया जा सकता है।
भारत ने कुछ देशों के साथ स्थानीय मुद्राओं में व्यापार की संभावनाएँ बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए हैं। इसका एक लाभ यह है कि भारतीय मुद्रा को अंतरराष्ट्रीय व्यापार में धीरे-धीरे अधिक उपयोगिता मिल सकती है। इससे रुपये के अंतरराष्ट्रीयकरण की प्रक्रिया को गति मिल सकती है।
लेकिन रुपये को वैश्विक मुद्रा बनाने के लिए केवल स्थानीय मुद्रा में व्यापार पर्याप्त नहीं होगा। भारत को मजबूत वित्तीय बाजार, स्थिर मुद्रास्फीति, पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार, पूंजी बाजारों की गहराई और अंतरराष्ट्रीय निवेशकों का विश्वास बढ़ाना होगा। इसलिए डी-डॉलराइजेशन भारत के लिए केवल डॉलर से दूरी बनाने का प्रश्न नहीं, बल्कि रुपये को अधिक विश्वसनीय वैश्विक मुद्रा बनाने की दीर्घकालिक परियोजना भी है।
इस परिवर्तन का एक संभावित लाभ वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में शक्ति का अधिक संतुलित वितरण हो सकता है। यदि अनेक मुद्राएँ अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वित्त में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, तो किसी एक देश की मौद्रिक नीति का पूरी दुनिया पर प्रभाव कुछ हद तक कम हो सकता है। विकासशील देशों को भी अपने व्यापारिक हितों के अनुसार विभिन्न भुगतान विकल्प चुनने की अधिक स्वतंत्रता मिल सकती है।
लेकिन इसके साथ जोखिम भी हैं। यदि वैश्विक अर्थव्यवस्था कई अलग-अलग वित्तीय समूहों में विभाजित हो जाती है, तो व्यापारिक लागत बढ़ सकती है। अलग-अलग मुद्राओं में भुगतान से विनिमय दर का जोखिम बढ़ेगा और वित्तीय प्रणालियों के बीच समन्वय कठिन हो सकता है। यदि आर्थिक व्यवस्था अत्यधिक खंडित (fragmented) हो गई, तो वैश्विक व्यापार की दक्षता प्रभावित हो सकती है।
इसलिए भविष्य की वैश्विक आर्थिक व्यवस्था शायद डॉलर-विहीन नहीं, बल्कि बहु-मुद्रा आधारित होगी। डॉलर महत्वपूर्ण बना रह सकता है, लेकिन उसके साथ यूरो, युआन, येन, पाउंड, रुपया और अन्य मुद्राओं की भूमिका बढ़ सकती है। ऐसी व्यवस्था में देशों के बीच आर्थिक संबंध किसी एक मुद्रा पर निर्भर होने के बजाय विभिन्न विकल्पों पर आधारित होंगे।
“The world economy is no longer a single centre with many peripheries; it is increasingly a network of interconnected centres.”
भारत जैसे देशों के लिए इस परिवर्तन का सबसे अच्छा उत्तर किसी एक मुद्रा के विरुद्ध खड़ा होना नहीं, बल्कि अपनी आर्थिक क्षमता को मजबूत करना है। व्यापार का विविधीकरण, ऊर्जा स्रोतों की विविधता, मजबूत घरेलू वित्तीय बाजार, डिजिटल भुगतान अवसंरचना और रुपये का क्रमिक अंतरराष्ट्रीयकरण भारत को बदलती व्यवस्था में अधिक सक्षम बना सकते हैं।
“A nation’s economic strength ultimately rests on the strength and resilience of its own foundations.”
इस प्रकार डॉलर निर्भरता में कमी को डॉलर के अंत के रूप में देखना उचित नहीं होगा। यह वैश्विक आर्थिक शक्ति के धीरे-धीरे बहुध्रुवीय होने की प्रक्रिया का हिस्सा है। आने वाले वर्षों में दुनिया ऐसी वित्तीय व्यवस्था की ओर बढ़ सकती है जहाँ डॉलर सबसे महत्वपूर्ण मुद्राओं में बना रहे, लेकिन उसका प्रभुत्व पहले की तुलना में अधिक संतुलित हो।
भारत के लिए इस बदलते दौर की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह भावनात्मक रूप से किसी मुद्रा का विरोध करने के बजाय मजबूत अर्थव्यवस्था, विश्वसनीय संस्थाएँ, स्थिर मुद्रा और विविध अंतरराष्ट्रीय साझेदारियाँ विकसित करता है। वास्तविक आर्थिक स्वायत्तता डॉलर से केवल दूरी बनाने में नहीं, बल्कि इतनी मजबूत आर्थिक क्षमता विकसित करने में है कि भारत वैश्विक व्यवस्था में अपने हितों के अनुसार स्वतंत्र और संतुलित निर्णय ले सके।