Table of Contents
जे करा लाठी ओकरा भैंस (71st BPSC Essay)
“Power tends to corrupt, and absolute power tends to corrupt absolutely.” — Lord Acton
समाज में शक्ति का अपना महत्व है। शक्ति के माध्यम से व्यक्ति अपने अधिकारों की रक्षा कर सकता है, व्यवस्था बनाए रख सकता है और दूसरों के हितों की रक्षा भी कर सकता है। लेकिन जब शक्ति के साथ न्याय, नैतिकता और उत्तरदायित्व का संतुलन समाप्त हो जाता है, तब वही शक्ति शोषण का साधन बन जाती है। बिहार की लोकभाषा की कहावत “जे करा लाठी ओकरा भैंस” इसी सामाजिक वास्तविकता को अत्यंत सरल और प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करती है। इसका आशय है कि जिसके पास शक्ति या प्रभाव होता है, कई बार वही संसाधनों और अधिकारों पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लेता है। यह कहावत केवल ग्रामीण जीवन की स्थिति का वर्णन नहीं करती, बल्कि सत्ता, सामाजिक असमानता और न्याय के संबंध पर गहरी टिप्पणी करती है।
एक गाँव की कल्पना कीजिए जहाँ एक गरीब किसान की भैंस किसी प्रभावशाली व्यक्ति द्वारा अपने अधिकार में कर ली जाती है। किसान जानता है कि भैंस उसकी है, लेकिन उसके पास न पर्याप्त धन है, न राजनीतिक प्रभाव और न ही सामाजिक शक्ति। दूसरी ओर प्रभावशाली व्यक्ति के पास लोग, संसाधन और दबदबा है। गाँव के लोग सच्चाई जानते हुए भी उसके विरुद्ध बोलने से डरते हैं। ऐसी स्थिति में सत्य किसान के पास है, लेकिन शक्ति दूसरे व्यक्ति के पास। यही परिस्थिति इस कहावत को जन्म देती है।
यह कहावत मूल रूप से शक्ति और अधिकार के असंतुलन को दर्शाती है। आदिम समाजों में शारीरिक शक्ति ही जीवन और संपत्ति की सुरक्षा का प्रमुख साधन थी। जिसके पास अधिक बल था, वह दूसरों पर प्रभुत्व स्थापित कर सकता था। धीरे-धीरे मानव समाज ने कानून और संस्थाओं का विकास किया ताकि शक्ति के स्थान पर न्याय और नियम सामाजिक व्यवस्था का आधार बन सकें।
आधुनिक लोकतंत्र इसी परिवर्तन की देन है। आज किसी व्यक्ति को केवल इसलिए किसी संपत्ति या अधिकार का मालिक नहीं माना जा सकता कि वह अधिक शक्तिशाली है। कानून का शासन यह सुनिश्चित करता है कि अधिकार शक्ति से नहीं, बल्कि वैधानिक व्यवस्था से निर्धारित हों।
“Where law ends, tyranny begins.” — John Locke
जॉन लॉक का यह विचार स्पष्ट करता है कि जब कानून की सीमा समाप्त हो जाती है, तब मनमानी और अत्याचार का रास्ता खुल जाता है। इसलिए किसी भी सभ्य समाज में कानून का शासन आवश्यक है।
भारत का संविधान इसी सिद्धांत पर आधारित है। संविधान सभी नागरिकों को समानता, स्वतंत्रता और न्याय का अधिकार देता है। अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता की बात करता है। इसका अर्थ है कि कोई व्यक्ति अपनी जाति, धन, पद या राजनीतिक प्रभाव के कारण कानून से ऊपर नहीं हो सकता। इस दृष्टि से लोकतांत्रिक संविधान “जे करा लाठी ओकरा भैंस” जैसी मानसिकता को चुनौती देता है।
फिर भी वास्तविक जीवन में शक्ति का प्रभाव समाप्त नहीं हुआ है। राजनीति में धनबल और बाहुबल का प्रयोग इसका एक उदाहरण है। यदि कोई व्यक्ति अपने आर्थिक संसाधनों या राजनीतिक प्रभाव के कारण कानून और प्रशासन को प्रभावित करने में सक्षम हो जाता है, तो लोकतांत्रिक समानता कमजोर पड़ती है। चुनाव में मतदाता की स्वतंत्रता भी तब प्रभावित हो सकती है जब धन, भय या दबाव का इस्तेमाल किया जाए।
इसी प्रकार प्रशासन में भी यदि किसी प्रभावशाली व्यक्ति को नियमों से अलग सुविधा मिलती है और सामान्य नागरिक को अपने अधिकार के लिए लंबे समय तक संघर्ष करना पड़ता है, तो जनता के भीतर व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा होता है। लोकतंत्र की वास्तविक परीक्षा यही है कि शक्तिशाली और कमजोर दोनों के लिए कानून समान रूप से लागू हो।
डॉ. भीमराव अंबेडकर का विचार यहाँ अत्यंत प्रासंगिक है—
“Political democracy cannot last unless there lies at the base of it social democracy.”
सामाजिक लोकतंत्र का अर्थ केवल राजनीतिक अधिकार देना नहीं है, बल्कि समाज में स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की भावना स्थापित करना भी है। यदि सामाजिक और आर्थिक असमानता इतनी अधिक हो जाए कि कमजोर व्यक्ति अपने अधिकारों की रक्षा ही न कर सके, तो लोकतंत्र का वास्तविक उद्देश्य अधूरा रह जाता है।
यह कहावत आर्थिक असमानता पर भी लागू होती है। जिसके पास अधिक धन है, उसके पास बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य, कानूनी सहायता और राजनीतिक पहुँच के अधिक अवसर हो सकते हैं। गरीब व्यक्ति कई बार अपनी आवश्यकताओं के लिए भी दूसरों पर निर्भर रहता है। ऐसी परिस्थिति में आर्थिक शक्ति धीरे-धीरे सामाजिक और राजनीतिक शक्ति में बदल सकती है।
लेकिन धन स्वयं समस्या नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब धन और शक्ति का उपयोग दूसरों के अधिकारों को दबाने के लिए किया जाए। एक उद्योगपति अपनी आर्थिक क्षमता का उपयोग रोजगार पैदा करने और समाज के विकास में कर सकता है। उसी प्रकार कोई राजनीतिक नेता अपनी शक्ति का उपयोग जनहित में कर सकता है। इसलिए शक्ति का मूल्य इस बात से तय होता है कि उसका उपयोग किस उद्देश्य से किया जा रहा है।
“With great power comes great responsibility.”
यह प्रसिद्ध विचार इस कहावत का सकारात्मक विकल्प प्रस्तुत करता है। शक्ति का अर्थ केवल अधिकार नहीं, बल्कि जिम्मेदारी भी है। एक अधिकारी के पास प्रशासनिक शक्ति है तो उसके साथ नागरिकों के प्रति जवाबदेही भी जुड़ी है। एक जनप्रतिनिधि के पास राजनीतिक शक्ति है तो उसका दायित्व जनता की सेवा करना है। एक न्यायाधीश के पास न्याय करने की शक्ति है तो उससे निष्पक्षता की अपेक्षा की जाती है।
ग्रामीण समाज में पंचायती राज व्यवस्था के संदर्भ में भी यह कहावत महत्वपूर्ण है। पंचायतों को स्थानीय स्तर पर विकास और निर्णय लेने की शक्ति दी गई है। इसका उद्देश्य सत्ता का विकेंद्रीकरण और ग्रामीण जनता का सशक्तीकरण है। लेकिन यदि पंचायत की शक्ति कुछ परिवारों, जातीय समूहों या स्थानीय प्रभावशाली लोगों के हाथ में केंद्रित हो जाए, तो लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण स्थानीय प्रभुत्व में बदल सकता है। इसलिए ग्राम सभा, सामाजिक अंकेक्षण, पारदर्शिता और नागरिक सहभागिता आवश्यक हैं।
महात्मा गांधी का ग्राम स्वराज का विचार इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण है। वे ऐसी व्यवस्था चाहते थे जिसमें गाँव के लोग स्वयं अपने विकास और शासन में सक्रिय भागीदारी करें। सत्ता का विकेंद्रीकरण तभी सार्थक है जब वह आम नागरिक को सशक्त बनाए, न कि स्थानीय प्रभुत्वशाली वर्ग को।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भी शक्ति का असंतुलन दिखाई देता है। शक्तिशाली राष्ट्र अपने आर्थिक और सैन्य प्रभाव का उपयोग कमजोर देशों पर दबाव बनाने के लिए कर सकते हैं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय कानून, बहुपक्षीय संस्थाएँ और कूटनीति इस शक्ति को संतुलित करने का प्रयास करती हैं। विश्व व्यवस्था में स्थायी शांति तभी संभव है जब शक्ति के साथ न्याय और पारस्परिक सम्मान भी मौजूद हो।
आज डिजिटल युग में शक्ति का एक नया रूप डेटा और तकनीकी नियंत्रण है। बड़ी तकनीकी कंपनियों के पास विशाल मात्रा में डेटा और आर्थिक संसाधन हैं। इससे उन्हें उपभोक्ताओं और बाजार पर प्रभाव डालने की क्षमता मिलती है। यदि इस शक्ति पर पारदर्शिता और उचित नियमन न हो, तो तकनीकी प्रगति भी असमानता और एकाधिकार को बढ़ा सकती है।
इसलिए आधुनिक समाज में संस्थागत नियंत्रण अत्यंत आवश्यक है। स्वतंत्र न्यायपालिका, निष्पक्ष प्रशासन, स्वतंत्र मीडिया, सूचना का अधिकार, चुनावी पारदर्शिता और सक्रिय नागरिक समाज शक्ति के दुरुपयोग को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मजबूत संस्थाएँ यह सुनिश्चित करती हैं कि कोई व्यक्ति या समूह अपनी शक्ति के कारण कानून से ऊपर न हो जाए।
साथ ही नागरिकों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। यदि लोग अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हों, अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाएँ और लोकतांत्रिक संस्थाओं में सक्रिय भागीदारी करें, तो शक्ति का असंतुलन कम किया जा सकता है। शिक्षा और जागरूकता कमजोर वर्गों को अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने की क्षमता देती है।
हालाँकि, यह भी समझना आवश्यक है कि हर प्रकार की शक्ति नकारात्मक नहीं होती। शक्ति का उपयोग समाज में व्यवस्था, सुरक्षा और विकास के लिए आवश्यक है। पुलिस की शक्ति अपराध रोकने के लिए चाहिए, राज्य की शक्ति कानून लागू करने के लिए चाहिए और सरकार की शक्ति जनकल्याणकारी योजनाएँ चलाने के लिए चाहिए। समस्या शक्ति के अस्तित्व में नहीं, बल्कि उसके अनियंत्रित और अन्यायपूर्ण प्रयोग में है।
“Power is not an end in itself; it is a means to serve.”
यही लोकतांत्रिक शासन की मूल भावना है। सत्ता यदि सेवा का माध्यम बनती है तो समाज को मजबूत करती है; लेकिन यदि सत्ता व्यक्तिगत स्वार्थ और प्रभुत्व का माध्यम बन जाए तो लोकतंत्र कमजोर होता है।
अंततः “जे करा लाठी ओकरा भैंस” एक ऐसी लोक कहावत है जो समाज में शक्ति और अधिकार के असंतुलन की वास्तविकता को सामने लाती है। यह हमें उस व्यवस्था की याद दिलाती है जहाँ बलवान व्यक्ति कमजोर के अधिकारों पर कब्जा कर सकता है। लेकिन आधुनिक लोकतांत्रिक समाज का लक्ष्य इस स्थिति को स्वीकार करना नहीं, बल्कि इसे बदलना है।
“Justice cannot be for one side alone, but must be for both.” — Eleanor Roosevelt
सभ्य समाज की पहचान इस बात से नहीं होती कि उसके पास कितने शक्तिशाली लोग हैं, बल्कि इस बात से होती है कि कमजोर व्यक्ति के अधिकार कितनी मजबूती से सुरक्षित हैं। जब कानून शक्ति से ऊपर होगा, संस्थाएँ निष्पक्ष होंगी और नागरिक अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होंगे, तब “जे करा लाठी ओकरा भैंस” जैसी स्थिति धीरे-धीरे समाप्त होगी और उसकी जगह न्याय, समानता और अधिकार पर आधारित सामाजिक व्यवस्था स्थापित होगी।