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Chapter 6 MCQs in Hindi; नए प्रश्न नए विचार
1. बौद्ध धर्म के संस्थापक कौन थे?
Answer: A
बौद्ध धर्म के संस्थापक सिद्धार्थ गौतम थे, जिन्हें आगे चलकर “गौतम बुद्ध” कहा गया। उनका जन्म लगभग 563 ईसा पूर्व लुम्बिनी (वर्तमान नेपाल) में शाक्य क्षत्रिय कुल में हुआ था। उनके पिता शुद्धोधन शाक्य गण के प्रमुख थे तथा माता का नाम महामाया था। जन्म के कुछ समय बाद उनका पालन-पोषण महाप्रजापति गौतमी ने किया।
सिद्धार्थ ने 29 वर्ष की आयु में गृह त्याग किया, जिसे बौद्ध साहित्य में “महाभिनिष्क्रमण” कहा जाता है। कई वर्षों की तपस्या के बाद उन्हें बोधगया में निरंजना नदी के तट पर पीपल वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ। इसके बाद वे “बुद्ध” कहलाए, जिसका अर्थ है — ज्ञान प्राप्त करने वाला।
उन्होंने अपना प्रथम उपदेश सारनाथ में दिया, जिसे “धर्मचक्र प्रवर्तन” कहा जाता है। बुद्ध ने चार आर्य सत्य, अष्टांगिक मार्ग और मध्यम मार्ग का सिद्धांत दिया। उनकी शिक्षाएँ प्राकृत/पाली भाषा में थीं, जिससे सामान्य लोग भी उन्हें समझ सके।
महावीर जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर थे, जबकि अशोक मौर्य शासक थे जिन्होंने कलिंग युद्ध के बाद बौद्ध धर्म अपनाया। चन्द्रगुप्त मौर्य मौर्य साम्राज्य के संस्थापक थे। प्रतियोगी परीक्षाओं में इन व्यक्तियों के कार्यों में अंतर पूछा जाता है।
इस प्रकार बौद्ध धर्म के संस्थापक गौतम बुद्ध थे।
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2. बुद्ध का सम्बन्ध निम्न में से किस गण से था?
Answer: B
गौतम बुद्ध का संबंध शाक्य गण से था। वे शाक्य क्षत्रिय कुल में जन्मे थे, इसलिए उन्हें “शाक्यमुनि” भी कहा जाता है। शाक्य एक छोटा गणराज्य था जिसकी राजधानी कपिलवस्तु मानी जाती है।
प्राचीन भारत में दो प्रकार की शासन व्यवस्थाएँ प्रमुख थीं — राजतंत्र और गणतंत्र। शाक्य गण एक गणराज्य था, जहाँ शासन किसी एक राजा के बजाय प्रमुख कुलों के लोगों द्वारा संचालित होता था। बुद्ध का जन्म इसी राजनीतिक व्यवस्था वाले क्षेत्र में हुआ था।
बुद्ध के पिता शुद्धोधन शाक्य गण के प्रमुख थे। युवावस्था में सिद्धार्थ ने संसार के दुखों को देखकर गृह त्याग किया और ज्ञान प्राप्ति के लिए तपस्या की। बाद में उन्होंने बौद्ध धर्म की स्थापना की।
वज्जि भी एक प्रसिद्ध गणसंघ था जिसकी राजधानी वैशाली थी। मगध एक शक्तिशाली महाजनपद था, जहाँ बाद में बिम्बिसार और अजातशत्रु जैसे शासक हुए। ज्ञातृक गण का संबंध महावीर स्वामी से माना जाता है। परीक्षाओं में बुद्ध और महावीर के गणों में अंतर पूछा जाता है।
इस प्रकार बुद्ध शाक्य गण से संबंधित थे।
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3. निम्न में से कौन-सा विकल्प असत्य है?
Answer: C
विकल्प C असत्य है क्योंकि गौतम बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश लुम्बिनी में नहीं, बल्कि सारनाथ में दिया था। सारनाथ वाराणसी के निकट स्थित है और यहीं बुद्ध ने अपने पाँच शिष्यों को पहला उपदेश दिया था। इस घटना को “धर्मचक्र प्रवर्तन” कहा जाता है।
लुम्बिनी बुद्ध का जन्मस्थान है, जबकि बोधगया ज्ञान प्राप्ति का स्थान है। कुशीनगर वह स्थान है जहाँ बुद्ध ने महापरिनिर्वाण प्राप्त किया। इन चार प्रमुख बौद्ध स्थलों — लुम्बिनी, बोधगया, सारनाथ और कुशीनगर — से संबंधित प्रश्न लगभग सभी प्रतियोगी परीक्षाओं में पूछे जाते हैं।
बुद्ध शाक्य क्षत्रिय कुल से थे और उन्होंने बोधगया में बोधिवृक्ष के नीचे तपस्या करके ज्ञान प्राप्त किया। ज्ञान प्राप्ति के बाद उन्होंने लगभग 45 वर्षों तक अपने उपदेशों का प्रचार किया।
कुशीनगर में 483 ईसा पूर्व के आसपास बुद्ध का महापरिनिर्वाण हुआ माना जाता है। बौद्ध धर्म से जुड़े स्तूप, विहार और अशोक स्तंभ भी परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।
इस प्रकार असत्य कथन यह है कि बुद्ध ने पहला उपदेश लुम्बिनी में दिया।
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4. ज्ञान प्राप्ति होने के बाद बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश कहाँ दिया था?
Answer: B
ज्ञान प्राप्ति के बाद गौतम बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश सारनाथ में दिया था। सारनाथ उत्तर प्रदेश में वाराणसी के निकट स्थित है और बौद्ध धर्म का अत्यंत महत्वपूर्ण तीर्थस्थल माना जाता है।
बुद्ध को बोधगया में ज्ञान प्राप्त हुआ था। इसके बाद वे अपने पाँच पूर्व साथियों से मिलने सारनाथ पहुँचे और उन्हें पहला उपदेश दिया। इस उपदेश को “धर्मचक्र प्रवर्तन” कहा जाता है।
सारनाथ में अशोक द्वारा निर्मित सिंह स्तंभ विशेष रूप से प्रसिद्ध है। इसी स्तंभ का सिंह शीर्ष भारत का राष्ट्रीय प्रतीक है। धम्मेक स्तूप भी सारनाथ का प्रमुख ऐतिहासिक स्मारक है।
बोधगया ज्ञान प्राप्ति से, सारनाथ प्रथम उपदेश से और कुशीनगर महापरिनिर्वाण से संबंधित है। वैशाली वज्जि संघ की राजधानी थी तथा बुद्ध कई बार वहाँ गए थे। परीक्षाओं में इन स्थलों का सही मिलान पूछा जाता है।
इस प्रकार बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश सारनाथ में दिया था।
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5. निम्नलिखित में से बुद्ध के संदर्भ में कौन-सा कथन सही नहीं है?
I. बुद्ध के अनुसार, यह जीवन कष्टों और दुखों से भरा है तथा हमारी इच्छाओं और लालसाओं के कारण ऐसा होता है।
II. उन्होंने लोगों को दयालु होने और मनुष्यों के साथ-साथ जानवरों के जीवन का भी आदर करने की शिक्षा दी।
III. बुद्ध ने अपनी शिक्षा प्राकृत भाषा में दी।
कूट:-
Answer: D
दिए गए तीनों कथन सही हैं, इसलिए सही उत्तर “इनमें से कोई नहीं” होगा। बुद्ध ने अपने उपदेशों में बताया कि जीवन दुःखों से भरा है और इन दुःखों का मुख्य कारण तृष्णा या इच्छाएँ हैं। यह सिद्धांत बौद्ध धर्म के “चार आर्य सत्य” का आधार है।
बुद्ध ने करुणा, अहिंसा और दया का संदेश दिया। उन्होंने मनुष्यों के साथ-साथ पशु-पक्षियों और सभी जीवों के प्रति दयालु व्यवहार करने पर बल दिया। यही कारण है कि बौद्ध धर्म में अहिंसा को विशेष महत्व प्राप्त है।
बुद्ध ने अपने उपदेश सामान्य जनता की भाषा प्राकृत/पाली में दिए। उस समय संस्कृत मुख्यतः विद्वानों तक सीमित थी। पाली भाषा में रचित बौद्ध ग्रंथ “त्रिपिटक” बौद्ध साहित्य का प्रमुख स्रोत हैं।
बुद्ध की शिक्षाओं में मध्यम मार्ग, अष्टांगिक मार्ग, कर्म सिद्धांत और पुनर्जन्म की अवधारणा महत्वपूर्ण हैं। बौद्ध धर्म का प्रसार सम्राट अशोक के शासनकाल में भारत से बाहर श्रीलंका, चीन, जापान और दक्षिण-पूर्व एशिया तक हुआ।
इस प्रकार दिए गए सभी कथन सही हैं।
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6. बुद्ध ने अपनी शिक्षा लोगों को प्राकृत भाषा में क्यों दी?
Answer: C
गौतम बुद्ध ने अपने उपदेश प्राकृत भाषा, विशेष रूप से पाली भाषा में दिए क्योंकि उस समय सामान्य जनता संस्कृत की अपेक्षा प्राकृत भाषा को अधिक समझती थी। वैदिक काल में संस्कृत मुख्यतः ब्राह्मणों, विद्वानों और उच्च वर्ग की भाषा मानी जाती थी, जबकि आम लोग विभिन्न प्राकृत भाषाओं का प्रयोग करते थे। बुद्ध का उद्देश्य केवल विद्वानों तक सीमित रहना नहीं था, बल्कि वे अपने विचार समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुँचाना चाहते थे।
बुद्ध ने मानव जीवन के दुःख, करुणा, अहिंसा और मध्यम मार्ग जैसे सिद्धांतों को सरल भाषा में समझाया। इसी कारण उनके उपदेश किसानों, व्यापारियों, स्त्रियों तथा सामान्य जनता के बीच तेजी से लोकप्रिय हुए। यदि वे संस्कृत जैसी कठिन भाषा का प्रयोग करते, तो उनके विचार सीमित वर्ग तक ही रह जाते।
बौद्ध धर्म के प्रमुख ग्रंथ “त्रिपिटक” पाली भाषा में लिखे गए। त्रिपिटक के तीन भाग हैं — विनय पिटक, सुत्त पिटक और अभिधम्म पिटक। इन ग्रंथों में बुद्ध के उपदेश, संघ के नियम तथा दार्शनिक विचार संकलित हैं। बाद में सम्राट अशोक ने भी अपने अभिलेख प्राकृत भाषा और ब्राह्मी लिपि में खुदवाए ताकि आम लोग उनके संदेश को समझ सकें।
बुद्ध की शिक्षाओं के व्यापक प्रसार का एक प्रमुख कारण उनकी सरल भाषा और जनसाधारण से सीधा संवाद था। यही कारण है कि बौद्ध धर्म भारत से बाहर श्रीलंका, चीन, जापान तथा दक्षिण-पूर्व एशिया तक फैल गया।
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7. उपनिषद का शाब्दिक अर्थ होता है?
Answer: B
‘उपनिषद’ शब्द का शाब्दिक अर्थ है — ‘गुरु के समीप बैठना’। यह शब्द ‘उप’ (निकट), ‘नि’ (नीचे) और ‘सद’ (बैठना) से मिलकर बना है। इसका आशय उस परंपरा से है जिसमें विद्यार्थी गुरु के पास बैठकर ज्ञान प्राप्त करते थे। उपनिषद भारतीय दर्शन और आध्यात्मिक चिंतन के महत्वपूर्ण ग्रंथ हैं।
उपनिषद उत्तर वैदिक काल के साहित्य का प्रमुख भाग हैं। इन्हें वेदों का अंतिम भाग माना जाता है, इसलिए इन्हें “वेदांत” भी कहा जाता है। इनमें आत्मा, ब्रह्म, मोक्ष, पुनर्जन्म और कर्म जैसे गूढ़ विषयों पर चर्चा की गई है। उपनिषदों में बाहरी कर्मकांडों की अपेक्षा ज्ञान और आत्मचिंतन को अधिक महत्व दिया गया।
उपनिषदों में गुरु और शिष्य के बीच संवाद शैली देखने को मिलती है। याज्ञवल्क्य और मैत्रेयी, गार्गी और याज्ञवल्क्य जैसे संवाद भारतीय दार्शनिक परंपरा के महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। गार्गी और मैत्रेयी जैसी विदुषी महिलाओं का उल्लेख यह दर्शाता है कि उस समय कुछ महिलाओं को भी उच्च शिक्षा प्राप्त थी।
प्रमुख उपनिषदों में ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, छांदोग्य और बृहदारण्यक उपनिषद विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। बाद में आदि शंकराचार्य ने उपनिषदों की व्याख्या करते हुए अद्वैत वेदांत दर्शन का विकास किया। भारतीय दर्शन, बौद्ध धर्म और जैन धर्म पर उपनिषदों का गहरा प्रभाव पड़ा।
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8. निम्नलिखित में से उपनिषद के संदर्भ में सही कथन को चुनें :
I. उपनिषद में अध्यापकों और विद्यार्थियों के बीच बातचीत का संकलन किया गया है।
II. इन चर्चाओं में गार्गी, घोषा, मैत्रेयी जैसी स्त्री-विचारकों का भी उल्लेख मिलता है।
Answer: C
उपनिषद भारतीय ज्ञान परंपरा के महत्वपूर्ण ग्रंथ हैं, जिनमें अध्यापकों और विद्यार्थियों के बीच दार्शनिक संवादों का संकलन मिलता है। इन संवादों में आत्मा, ब्रह्म, कर्म, मोक्ष तथा जीवन के उद्देश्य जैसे विषयों पर गहराई से चर्चा की गई है। इसलिए पहला कथन सही है।
दूसरा कथन भी सही है क्योंकि उपनिषदों और वैदिक साहित्य में गार्गी, मैत्रेयी तथा घोषा जैसी विदुषी महिलाओं का उल्लेख मिलता है। गार्गी वाचक्नवी विशेष रूप से अपने दार्शनिक वाद-विवाद के लिए प्रसिद्ध थीं। उन्होंने याज्ञवल्क्य जैसे विद्वानों से प्रश्न पूछकर अपनी विद्वत्ता का परिचय दिया। मैत्रेयी को भी ब्रह्मज्ञान में गहरी रुचि थी।
उपनिषदों में ज्ञान को यज्ञ और कर्मकांड से अधिक महत्वपूर्ण माना गया। इस काल में दार्शनिक चिंतन का विकास हुआ और लोगों ने जीवन तथा ब्रह्मांड से जुड़े गहरे प्रश्नों पर विचार करना शुरू किया। यही कारण है कि उपनिषद भारतीय दर्शन का आधार माने जाते हैं।
उपनिषदों का प्रभाव केवल हिंदू धर्म तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बौद्ध और जैन दर्शन पर भी इसका प्रभाव दिखाई देता है। आत्मा, कर्म और मोक्ष जैसी अवधारणाएँ आगे चलकर भारतीय धार्मिक परंपराओं का महत्वपूर्ण हिस्सा बनीं।
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9. जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर कौन थे?
Answer: B
जैन धर्म के 24वें और अंतिम तीर्थंकर वर्धमान महावीर थे। उनका जन्म लगभग 540 ईसा पूर्व वैशाली के निकट कुंडग्राम में हुआ था। वे ज्ञातृक या लिच्छवि कुल के क्षत्रिय परिवार से संबंधित थे। उनके पिता सिद्धार्थ और माता त्रिशला थीं।
महावीर से पहले 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ थे, जिन्होंने जैन धर्म के प्रारंभिक सिद्धांतों का प्रचार किया। महावीर ने इन्हीं शिक्षाओं को आगे बढ़ाया और जैन धर्म को अधिक संगठित रूप प्रदान किया। उन्होंने 30 वर्ष की आयु में गृह त्याग किया और लगभग 12 वर्षों तक कठोर तपस्या की।
ज्ञान प्राप्ति के बाद महावीर ने अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य के सिद्धांतों का प्रचार किया। जैन धर्म में अहिंसा को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। महावीर का मानना था कि सभी जीवों में आत्मा होती है, इसलिए किसी भी जीव को हानि नहीं पहुँचानी चाहिए।
महावीर ने अपने उपदेश प्राकृत भाषा में दिए ताकि सामान्य लोग उन्हें समझ सकें। उनके अनुयायी उन्हंा “जिन” कहते थे, जिसका अर्थ है इंद्रियों पर विजय प्राप्त करने वाला। इसी से “जैन” शब्द की उत्पत्ति हुई।
महावीर की मृत्यु पावापुरी (बिहार) में हुई, जिसे जैन धर्म में निर्वाण कहा जाता है। जैन धर्म आगे चलकर दो प्रमुख शाखाओं — दिगंबर और श्वेतांबर — में विभाजित हो गया।
CLASS-6 CHAPTER-6 PAGE NO.-56
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10. महावीर स्वामी ने कितने वर्ष की आयु में घर त्याग किये थे?
Answer: C
वर्धमान महावीर ने 30 वर्ष की आयु में गृह त्याग किया था। वे वैशाली के निकट कुंडग्राम के क्षत्रिय परिवार में जन्मे थे। प्रारंभिक जीवन उन्होंने राजकुमार की तरह बिताया, लेकिन सांसारिक जीवन से संतुष्ट न होकर उन्होंने सत्य और आत्मज्ञान की खोज का मार्ग अपनाया।
गृह त्याग के बाद महावीर ने लगभग 12 वर्षों तक कठोर तपस्या की। इस दौरान उन्होंने अत्यंत सादा जीवन व्यतीत किया और आत्मसंयम पर विशेष बल दिया। कठिन साधना के बाद उन्हें कैवल्य ज्ञान प्राप्त हुआ। इसके बाद उन्होंने अपने उपदेशों का प्रचार प्रारंभ किया।
महावीर ने जैन धर्म के पाँच प्रमुख सिद्धांतों — अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य — पर बल दिया। उन्होंने सभी जीवों के प्रति दया और करुणा का संदेश दिया। जैन धर्म में तपस्या, आत्मसंयम और त्याग को अत्यधिक महत्व दिया जाता है।
महावीर के समय मगध एक शक्तिशाली महाजनपद था और बिम्बिसार तथा अजातशत्रु जैसे शासकों का शासन था। महावीर और गौतम बुद्ध लगभग समकालीन माने जाते हैं। दोनों ने कर्मकांडों का विरोध किया और सरल जीवन, नैतिकता तथा आत्मअनुशासन पर बल दिया।
महावीर की मृत्यु पावापुरी में हुई। जैन परंपरा के अनुसार उनके निर्वाण दिवस को दीपावली के रूप में भी जोड़ा जाता है।
CLASS-6 CHAPTER-6 PAGE NO.-56
11. निम्नलिखित में महावीर स्वामी के बारे में कौन सा कथन सही नहीं है?
Answer: C
महावीर स्वामी ने अपनी शिक्षाएँ पाली भाषा में नहीं बल्कि प्राकृत भाषा में दी थीं। इसलिए विकल्प (C) गलत है। उस समय सामान्य जनता संस्कृत की अपेक्षा प्राकृत भाषा को अधिक समझती थी, इसलिए महावीर ने अपने उपदेश जनभाषा में दिए ताकि उनके विचार अधिक लोगों तक पहुँच सकें। मगध क्षेत्र में बोली जाने वाली प्राकृत भाषा को मागधी भी कहा जाता था।
महावीर जैन धर्म के 24वें और अंतिम तीर्थंकर थे। उनका जन्म वैशाली के निकट कुंडग्राम में हुआ था। वे वज्जि संघ के लिच्छवि कुल से संबंधित क्षत्रिय राजकुमार थे। उन्होंने 30 वर्ष की आयु में गृह त्याग किया और लगभग 12 वर्षों तक कठोर तपस्या करने के बाद कैवल्य ज्ञान प्राप्त किया।
महावीर ने अहिंसा को जीवन का सर्वोच्च सिद्धांत माना। उनका मानना था कि प्रत्येक जीव में आत्मा होती है, इसलिए किसी भी जीव को हानि नहीं पहुँचानी चाहिए। उन्होंने सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य पर भी विशेष बल दिया।
जैन धर्म में तपस्या, आत्मसंयम और त्याग को अत्यधिक महत्व दिया गया है। महावीर के उपदेशों ने समाज में नैतिकता, करुणा और जीवों के प्रति दया की भावना को मजबूत किया।
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12. संस्कृत भाषा में व्याकरण की रचना करने वाले विद्वान कौन थे?
Answer: B
संस्कृत भाषा के महान व्याकरणाचार्य पाणिनि थे। उन्होंने संस्कृत व्याकरण का प्रसिद्ध ग्रंथ ‘अष्टाध्यायी’ लिखा, जो विश्व के सबसे महत्वपूर्ण व्याकरण ग्रंथों में से एक माना जाता है। इस ग्रंथ में लगभग 4000 सूत्र हैं, जिनमें संस्कृत भाषा के नियमों को अत्यंत व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
पाणिनि ने स्वरों और व्यंजनों को वैज्ञानिक क्रम में व्यवस्थित किया। उनके व्याकरण के नियम इतने व्यवस्थित थे कि आधुनिक भाषाविज्ञान में भी उनका विशेष महत्व माना जाता है। अष्टाध्यायी केवल भाषा का ग्रंथ नहीं है, बल्कि उस समय के समाज, संस्कृति और राजनीतिक स्थिति की भी जानकारी देता है।
पाणिनि का संबंध गांधार क्षेत्र से माना जाता है। वे उत्तर-पश्चिम भारत में रहते थे। संस्कृत भाषा को शुद्ध और व्यवस्थित रूप देने में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
शंकराचार्य अद्वैत वेदांत दर्शन के प्रवर्तक थे, जबकि घोषा ऋग्वैदिक काल की विदुषी थीं। शौनक वैदिक साहित्य से संबंधित विद्वान माने जाते हैं। इसलिए संस्कृत व्याकरण की रचना का श्रेय पाणिनि को दिया जाता है।
CLASS-6 CHAPTER-6 PAGE NO.-56
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13. महावीर स्वामी और गौतम बुद्ध ने अपनी शिक्षा किस भाषा में दी थी?
Answer: C
महावीर स्वामी और गौतम बुद्ध दोनों ने अपनी शिक्षाएँ प्राकृत भाषा में दी थीं। उस समय संस्कृत मुख्यतः ब्राह्मणों और विद्वानों की भाषा थी, जबकि सामान्य जनता प्राकृत भाषाएँ बोलती और समझती थी। इसलिए दोनों धर्म सुधारकों ने जनसाधारण तक अपने विचार पहुँचाने के लिए सरल भाषा का उपयोग किया।
गौतम बुद्ध की शिक्षाएँ पाली भाषा में संकलित हुईं, जो प्राकृत भाषा का ही एक रूप मानी जाती है। बौद्ध धर्म के प्रमुख ग्रंथ त्रिपिटक पाली भाषा में लिखे गए। महावीर स्वामी ने भी मागधी प्राकृत में अपने उपदेश दिए, जिससे आम लोग जैन धर्म के सिद्धांतों को समझ सके।
दोनों ने कर्मकांड और जटिल धार्मिक परंपराओं की अपेक्षा नैतिक जीवन, अहिंसा, करुणा और आत्मसंयम पर बल दिया। यही कारण था कि बौद्ध और जैन धर्म सामान्य जनता में तेजी से लोकप्रिय हुए।
ब्राह्मी किसी भाषा का नाम नहीं बल्कि एक प्राचीन लिपि थी, जिसमें बाद में सम्राट अशोक के अभिलेख लिखे गए। अवधी मध्यकालीन उत्तर भारत की प्रमुख भाषा थी, जिसका संबंध भक्ति कालीन साहित्य से अधिक माना जाता है।
CLASS-6 CHAPTER-6 PAGE NO.-56
14. निम्नलिखित में से जैन धर्म के सम्बन्धित कौन सा कथन सही नहीं है?
Answer: D
विकल्प (D) गलत है क्योंकि वर्तमान रूप में उपलब्ध जैन धर्म की शिक्षाएँ लगभग 1500 वर्ष पूर्व गुजरात के वल्लभी नामक स्थान पर लिखी गई थीं, न कि जामनगर में। वल्लभी जैन धर्म का एक महत्वपूर्ण केंद्र था, जहाँ जैन ग्रंथों का संकलन और संरक्षण किया गया।
जैन धर्म की शिक्षाएँ प्रारंभ में मौखिक रूप से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाई जाती थीं। बाद में इन्हें लिखित रूप दिया गया। जैन धर्म में अहिंसा को सबसे अधिक महत्व दिया गया, इसलिए व्यापारियों और शहरी वर्ग ने इसका व्यापक समर्थन किया। व्यापारियों के लिए जैन धर्म के नियमों का पालन अपेक्षाकृत आसान था क्योंकि उनके व्यवसाय में जीवों की हिंसा कम होती थी।
दूसरी ओर किसानों के लिए जैन धर्म के कठोर अहिंसा सिद्धांतों का पालन कठिन था। खेती करते समय फसलों की रक्षा के लिए कीड़े-मकोड़ों को मारना पड़ता था, जो जैन धर्म की अहिंसा नीति के विरुद्ध माना जाता था। यही कारण है कि जैन धर्म व्यापारिक नगरों और शहरी क्षेत्रों में अधिक लोकप्रिय हुआ।
बाद की शताब्दियों में जैन धर्म उत्तर भारत से आगे बढ़कर गुजरात, राजस्थान, तमिलनाडु और कर्नाटक तक फैल गया। दक्षिण भारत में जैन धर्म के प्रभाव से अनेक मंदिर, गुफाएँ और मूर्तियाँ निर्मित हुईं। कर्नाटक का श्रवणबेलगोला जैन धर्म का प्रसिद्ध तीर्थ स्थल माना जाता है, जहाँ गोम्मटेश्वर बहुबली की विशाल प्रतिमा स्थित है।
CLASS-6 CHAPTER-6 PAGE NO.-57
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15. संघ में रहने वाले बौद्ध भिक्षुओं के लिए बनाये गये नियम किस ग्रंथ में मिलते हैं?
Answer: B
बौद्ध संघ में रहने वाले भिक्षुओं और भिक्षुणियों के लिए बनाए गए नियम ‘विनयपिटक’ में मिलते हैं। विनयपिटक बौद्ध धर्म के प्रमुख ग्रंथ ‘त्रिपिटक’ का एक महत्वपूर्ण भाग है। त्रिपिटक के तीन भाग हैं — विनयपिटक, सुत्तपिटक और अभिधम्म पिटक।
विनयपिटक में संघ के अनुशासन, आचार-विचार और दैनिक जीवन से संबंधित नियमों का वर्णन किया गया है। इसमें यह बताया गया है कि भिक्षु और भिक्षुणियाँ किस प्रकार जीवन व्यतीत करेंगे, भोजन ग्रहण करेंगे तथा समाज के साथ व्यवहार करेंगे। संघ में पुरुषों और महिलाओं के रहने की अलग-अलग व्यवस्था थी।
सुत्तपिटक में बुद्ध के उपदेश और प्रवचन संकलित हैं, जबकि अभिधम्म पिटक में बौद्ध दर्शन और दार्शनिक सिद्धांतों की विस्तृत व्याख्या मिलती है। जातक कथाओं में बुद्ध के पूर्व जन्मों की कथाएँ दी गई हैं, जिनका उद्देश्य नैतिक शिक्षा देना था।
बौद्ध संघ की स्थापना गौतम बुद्ध ने की थी। संघ में सभी वर्णों और वर्गों के लोगों को प्रवेश की अनुमति थी। यह उस समय की सामाजिक व्यवस्था की तुलना में अधिक उदार और समानतावादी माना जाता है। बौद्ध धर्म के प्रसार में संघ की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
CLASS-6 CHAPTER-6 PAGE NO.-57
16. निम्नलिखित में से बौद्ध संघ में प्रवेश लेने के सन्दर्भ में कौन सा कथन सही नहीं है?
I. संघ में पुरुष एवं स्त्रियों के रहने के लिए अलग-अलग व्यवस्था की गई थी।
II. सभी व्यक्ति संघ में प्रवेश ले सकते थे।
III. विवाहित महिलाओं को संघ में प्रवेश लेने के लिए अपने माता-पिता से अनुमति लेनी पड़ती थी।
IV. संघ में शामिल होने के लिए कर्जदारों को अपने देनदारों से अनुमति लेनी पड़ती थी।
Answer: C
तीसरा कथन गलत है क्योंकि विवाहित महिलाओं को बौद्ध संघ में प्रवेश लेने के लिए अपने माता-पिता से नहीं बल्कि अपने पति से अनुमति लेनी पड़ती थी। इसलिए विकल्प (C) सही उत्तर है।
बौद्ध संघ के नियमों की जानकारी मुख्यतः विनयपिटक से प्राप्त होती है। इसमें भिक्षुओं और भिक्षुणियों के जीवन, अनुशासन तथा संघ की व्यवस्था का विस्तृत वर्णन मिलता है। संघ में पुरुषों और महिलाओं के रहने की अलग-अलग व्यवस्था थी, इसलिए पहला कथन सही है।
बौद्ध धर्म अपेक्षाकृत उदार था और समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों को संघ में प्रवेश की अनुमति थी। फिर भी कुछ विशेष परिस्थितियों में अनुमति आवश्यक होती थी। बच्चों को अपने माता-पिता से अनुमति लेनी पड़ती थी। दासों को अपने स्वामी से अनुमति लेनी होती थी। राजा के यहाँ कार्य करने वाले लोगों को राजा से अनुमति प्राप्त करनी पड़ती थी। इसी प्रकार कर्जदारों को अपने देनदारों से अनुमति लेनी होती थी। इसलिए चौथा कथन भी सही है।
बौद्ध संघ उस समय की सामाजिक व्यवस्था की तुलना में अधिक समानतावादी माना जाता है। संघ में प्रवेश के बाद व्यक्ति सादा जीवन, अनुशासन, संयम और बुद्ध के उपदेशों का पालन करता था। बौद्ध धर्म के प्रसार में संघ की महत्वपूर्ण भूमिका रही और इसी माध्यम से बुद्ध के विचार भारत के विभिन्न भागों तथा बाद में श्रीलंका, चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया तक पहुँचे।
CLASS-6 CHAPTER-6 PAGE NO.-57
17. भिक्षुणी-भिक्षुणियाँ कहाँ रहते थे?
Answer: C
जैन तथा बौद्ध भिक्षु-भिक्षुणियाँ पूरे वर्ष एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमकर धर्म का प्रचार और उपदेश देते थे। वर्षा ऋतु में यात्रा करना कठिन हो जाता था, इसलिए वे एक ही स्थान पर निवास करते थे। ऐसे समय वे अपने अनुयायियों द्वारा बनाए गए अस्थायी निवासों अथवा पहाड़ी क्षेत्रों की प्राकृतिक गुफाओं में रहते थे। इसी कारण सही उत्तर विकल्प (C) गुफा है।
प्राचीन भारत में गुफाएँ केवल निवास स्थान नहीं थीं, बल्कि ध्यान, साधना और शिक्षा के प्रमुख केंद्र भी थीं। बौद्ध धर्म में भिक्षुओं के रहने के स्थान को ‘विहार’ कहा जाता था, जबकि पूजा और प्रार्थना स्थल ‘चैत्य’ कहलाते थे। पश्चिमी भारत में कई प्रसिद्ध शैलकृत गुफाओं का निर्माण हुआ, जिनमें कार्ले, भाजा, कन्हेरी, अजंता और एलोरा प्रमुख हैं। इन गुफाओं का निर्माण प्रायः व्यापारिक मार्गों के पास किया जाता था, जिससे व्यापारी वर्ग भी बौद्ध धर्म से जुड़ सके।
बौद्ध भिक्षु वर्षा ऋतु में जिस स्थान पर ठहरते थे, उसे ‘वर्षावास’ कहा जाता था। बाद में यही विहार शिक्षा और संस्कृति के केंद्र बन गए। नालंदा और विक्रमशिला जैसे प्रसिद्ध विश्वविद्यालय भी बौद्ध विहारों से विकसित हुए थे।
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18. पहाड़ियों को काटकर बने गई गुफा कार्ले गुफा, जहाँ भिक्षुणी-भिक्षुणियाँ इन स्थलों में रहकर ध्यान करते थे। यह गुफा कहाँ स्थित है?
Answer: B
कार्ले या कार्ला गुफाएँ वर्तमान महाराष्ट्र राज्य में स्थित हैं, इसलिए सही उत्तर विकल्प (B) महाराष्ट्र है। ये प्राचीन बौद्ध शैलकृत गुफाएँ हैं जिन्हें पहाड़ियों को काटकर बनाया गया था। यहाँ भिक्षु और भिक्षुणियाँ निवास करते थे तथा ध्यान और साधना किया करते थे।
कार्ले गुफाएँ भारत की सबसे महत्वपूर्ण बौद्ध गुफाओं में गिनी जाती हैं। इनका निर्माण मुख्यतः सातवाहन काल में हुआ माना जाता है। यहाँ स्थित विशाल चैत्यगृह भारतीय बौद्ध वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है। गुफा के अंदर बने विशाल स्तंभ, मेहराब तथा लकड़ी की शैली पर आधारित नक्काशी विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं।
महाराष्ट्र प्राचीन बौद्ध गुफा स्थापत्य का प्रमुख केंद्र रहा है। अजंता गुफाएँ अपनी चित्रकला के लिए प्रसिद्ध हैं, जबकि एलोरा गुफाओं में बौद्ध, जैन और हिंदू धर्म तीनों से संबंधित स्मारक मिलते हैं। कार्ले, भाजा और कन्हेरी गुफाएँ भी व्यापारिक मार्गों के निकट विकसित हुई थीं। व्यापारी वर्ग और शासकों ने इन गुफाओं के निर्माण में आर्थिक सहायता दी थी।
कार्ले गुफाओं में चैत्य और विहार दोनों प्रकार की संरचनाएँ मिलती हैं। चैत्य पूजा स्थल होते थे जबकि विहार भिक्षुओं के रहने के लिए बनाए जाते थे। बौद्ध धर्म के प्रसार में इन गुफाओं और विहारों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
19. निम्नलिखित में से असत्य कथन का चयन करें :-
I. बुद्ध के अनुयायी जब भिक्षुओं की श्रेणी में प्रवेश करते हैं तो वे अपना वर्ण, श्रेणी और परिवार त्याग देते हैं।
II. पहले मूर्तियों में बुद्ध की उपस्थिति सिर्फ खास संकेतों के माध्यम से दर्शाई जाती थी, अब बुद्ध की प्रतिमा भी बनने लगी।
III. पहले बोधिसत्व ज्ञान प्राप्ति के बाद एकांत वास करते थे लेकिन ऐसा करने के बजाय, वे लोगों को शिक्षा देने और मदद करने के लिए सांसारिक परिवेश में रहना ठीक समझने लगे।
कूट :-
Answer: D
दिए गए तीनों कथन सही हैं, इसलिए सही उत्तर विकल्प (D) “इनमें से कोई नहीं” है। बौद्ध संघ में प्रवेश करने के बाद व्यक्ति अपनी जाति, वर्ण, परिवार तथा सामाजिक पहचान का त्याग कर देता था। संघ में सभी भिक्षुओं को समान माना जाता था। यह व्यवस्था उस समय की कठोर वर्ण-व्यवस्था से अलग थी तथा बौद्ध धर्म की समानता और सामाजिक समरसता की भावना को दर्शाती थी। इसी कारण बौद्ध धर्म समाज के विभिन्न वर्गों में तेजी से लोकप्रिय हुआ।
प्रारंभिक बौद्ध कला में बुद्ध को प्रत्यक्ष मानव रूप में नहीं दर्शाया जाता था। उनकी उपस्थिति को प्रतीकों के माध्यम से दिखाया जाता था, जैसे पीपल का वृक्ष, धर्मचक्र, पदचिह्न, खाली सिंहासन या स्तूप। इसे ‘अनाइकोनिक परंपरा’ कहा जाता है। बाद में महायान बौद्ध धर्म के विकास के साथ बुद्ध की प्रतिमाएँ बनने लगीं। मथुरा और गांधार कला शैली बुद्ध प्रतिमाओं के निर्माण के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। गांधार कला पर यूनानी प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है, जबकि मथुरा शैली भारतीय विशेषताओं पर आधारित थी।
महायान बौद्ध धर्म में बोधिसत्व की अवधारणा अत्यंत महत्वपूर्ण बन गई। बोधिसत्व ऐसे व्यक्ति को कहा गया जो ज्ञान प्राप्ति के बाद केवल व्यक्तिगत निर्वाण प्राप्त करने के बजाय समाज में रहकर लोगों को शिक्षा और सहायता प्रदान करता है। महायान बौद्ध धर्म के प्रसार के साथ बोधिसत्व पूजा भी लोकप्रिय हुई। अवलोकितेश्वर, मंजुश्री और मैत्रेय प्रमुख बोधिसत्व माने जाते हैं। महायान बौद्ध धर्म आगे चलकर मध्य एशिया, चीन, कोरिया और जापान तक फैल गया।
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20. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए :
I. बुद्ध ने अपने उपदेश सामान्य लोगों की भाषा प्राकृत में दिए।
II. बुद्ध ने लोगों को स्वयं विचार करने के लिए प्रेरित किया।
III. बुद्ध ने पशु बलि और हिंसा को बढ़ावा दिया।
उपरोक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
Answer: B
भगवान बुद्ध भारतीय इतिहास के महानतम विचारकों और धर्म सुधारकों में से एक थे। उन्होंने लगभग 2500 वर्ष पहले अपने विचारों का प्रचार किया। उस समय समाज में अनेक प्रकार की धार्मिक जटिलताएँ और कर्मकांड प्रचलित थे। बुद्ध ने लोगों को सरल और व्यावहारिक जीवन जीने का मार्ग बताया।
कथन I सही है क्योंकि बुद्ध ने अपने उपदेश संस्कृत जैसी कठिन भाषा में न देकर सामान्य जनता की भाषा प्राकृत में दिए। इससे आम लोग उनके विचारों को आसानी से समझ सके। यही कारण था कि उनके उपदेश तेजी से लोगों के बीच लोकप्रिय हुए।
कथन II भी सही है क्योंकि बुद्ध केवल अंधविश्वास या परंपरा को मानने के पक्ष में नहीं थे। उन्होंने लोगों को यह शिक्षा दी कि किसी बात को केवल इसलिए स्वीकार न करें क्योंकि वह किसी गुरु या धर्मग्रंथ में कही गई है, बल्कि उसे अपने विवेक और तर्क से परखें। बुद्ध का यह दृष्टिकोण अत्यंत वैज्ञानिक और तार्किक माना जाता है।
कथन III गलत है क्योंकि बुद्ध अहिंसा और दया के समर्थक थे। उन्होंने मनुष्यों के साथ-साथ पशुओं के जीवन का भी सम्मान करने की शिक्षा दी। वे पशु बलि और हिंसा के विरोधी थे। उन्होंने कहा कि सभी प्राणियों के प्रति करुणा और दया का भाव रखना चाहिए।
बुद्ध के उपदेशों का मुख्य उद्देश्य लोगों को दुःख, लालसा और हिंसा से दूर कर मध्यम मार्ग अपनाने की प्रेरणा देना था। इसी कारण उनका धर्म और दर्शन विश्वभर में प्रसिद्ध हुआ।
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21. ‘संघ’ के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है?
Answer: C
प्राचीन भारत में बौद्ध और जैन धर्म के प्रसार में ‘संघ’ की महत्वपूर्ण भूमिका थी। भगवान बुद्ध और महावीर दोनों का मानना था कि सच्चे ज्ञान की प्राप्ति के लिए व्यक्ति को सांसारिक मोह-माया का त्याग करना चाहिए। इसी उद्देश्य से संघ की स्थापना की गई।
संघ एक ऐसा संगठन था जिसमें वे लोग रहते थे जिन्होंने अपना घर-परिवार छोड़कर धार्मिक जीवन अपनाया था। बौद्ध धर्म में संघ के सदस्यों को भिक्षु और भिक्षुणी कहा जाता था। वे अत्यंत सरल जीवन व्यतीत करते थे, ध्यान करते थे और लोगों को उपदेश देते थे। इसलिए विकल्प C सही है।
विकल्प A गलत है क्योंकि संघ केवल ब्राह्मणों तक सीमित नहीं था। इसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, व्यापारी, मजदूर, नाई, गणिकाएँ तथा दास तक शामिल हो सकते थे। इससे स्पष्ट होता है कि संघ अपेक्षाकृत अधिक समानता पर आधारित संस्था थी।
विकल्प B भी गलत है क्योंकि संघ में पुरुषों और महिलाओं दोनों को प्रवेश की अनुमति थी। हालांकि उनके रहने की व्यवस्था अलग-अलग होती थी। महिलाओं को भिक्षुणी कहा जाता था।
विकल्प D भी गलत है क्योंकि संघ व्यापारियों का संगठन नहीं था। यह धार्मिक जीवन अपनाने वाले लोगों का समुदाय था। हालांकि व्यापारियों ने संघ और बौद्ध धर्म को आर्थिक सहायता अवश्य प्रदान की।
संघ ने बौद्ध धर्म के विचारों को दूर-दूर तक फैलाने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भिक्षु और भिक्षुणियाँ गाँवों और नगरों में जाकर लोगों को धर्म और नैतिकता की शिक्षा देते थे। यही कारण है कि बौद्ध धर्म भारत के साथ-साथ अन्य देशों में भी फैल गया।
22. निम्नलिखित में से किस विकल्प में ‘उपनिषद’ और उससे संबंधित तथ्य का सही सुमेल है?
1. उपनिषद का शाब्दिक अर्थ — गुरु के समीप बैठना
2. आत्मा और ब्रह्म — दोनों अलग-अलग माने गए
3. उपनिषदों में शिक्षक और विद्यार्थियों के संवाद मिलते हैं
कूट :
Answer: B
उपनिषद भारतीय दर्शन और वैदिक साहित्य का अत्यंत महत्वपूर्ण भाग हैं। इनकी रचना उस समय हुई जब अनेक विचारक जीवन, मृत्यु, आत्मा और ब्रह्मांड से जुड़े गहरे प्रश्नों के उत्तर खोजने का प्रयास कर रहे थे। उपनिषदों में ज्ञान को संवाद और चर्चा के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है।
कथन 1 सही है क्योंकि ‘उपनिषद’ शब्द का शाब्दिक अर्थ है — “गुरु के समीप बैठना”। इसका आशय यह है कि विद्यार्थी अपने गुरु के पास बैठकर ज्ञान प्राप्त करते थे।
कथन 2 गलत है क्योंकि उपनिषदों के विचारकों का मानना था कि आत्मा (आत्मन्) और ब्रह्म (सार्वभौमिक आत्मा) अंततः एक ही हैं। वे यह मानते थे कि मृत्यु के बाद भी आत्मा बनी रहती है।
कथन 3 सही है क्योंकि उपनिषदों में शिक्षक और विद्यार्थियों के बीच हुए संवादों का संग्रह मिलता है। विचारों को सामान्य वार्तालाप के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिससे जटिल दार्शनिक विषयों को सरलता से समझाया जा सके।
उपनिषद भारतीय दर्शन की आधारशिला माने जाते हैं। इनमें आत्मा, ब्रह्म, सत्य और जीवन के उद्देश्य जैसे गहन विषयों पर विचार किया गया है। आगे चलकर शंकराचार्य जैसे महान दार्शनिकों ने भी उपनिषदों के विचारों को विकसित किया।
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23. ‘महावीर’ के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए :
I. वे जैन धर्म के 24वें और अंतिम तीर्थंकर थे।
II. उन्होंने अहिंसा और सत्य के पालन पर बल दिया।
III. उन्होंने अपने उपदेश संस्कृत भाषा में दिए।
उपरोक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
Answer: B
महावीर स्वामी जैन धर्म के सबसे महत्वपूर्ण धर्मगुरुओं में से एक थे। उनका जन्म लगभग 2500 वर्ष पूर्व हुआ था। वे वज्जि संघ के लिच्छवि कुल के क्षत्रिय राजकुमार थे। 30 वर्ष की आयु में उन्होंने गृह त्याग कर कठोर तपस्या आरंभ की और 12 वर्षों के कठिन जीवन के बाद उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ।
कथन I सही है क्योंकि महावीर जैन धर्म के 24वें और अंतिम तीर्थंकर माने जाते हैं। उन्होंने जैन धर्म के सिद्धांतों का व्यापक प्रचार किया।
कथन II भी सही है क्योंकि महावीर ने अहिंसा, सत्य, चोरी न करना, सादा जीवन और ब्रह्मचर्य पर विशेष बल दिया। उनका मानना था कि किसी भी जीव को कष्ट नहीं पहुँचाना चाहिए। उन्होंने कहा कि सभी जीव जीना चाहते हैं और जीवन सभी के लिए प्रिय है।
कथन III गलत है क्योंकि महावीर ने अपने उपदेश संस्कृत में नहीं बल्कि प्राकृत भाषा में दिए। इससे सामान्य लोग भी उनकी शिक्षाओं को आसानी से समझ सके।
महावीर की शिक्षाओं का समाज पर गहरा प्रभाव पड़ा। विशेष रूप से व्यापारियों ने जैन धर्म का समर्थन किया। समय के साथ जैन धर्म उत्तर भारत के साथ-साथ गुजरात, तमिलनाडु और कर्नाटक तक फैल गया।
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24. निम्नलिखित में से ‘विहार’ के संबंध में कौन-सा कथन सही है?
Answer: C
प्राचीन भारत में बौद्ध और जैन धर्म के प्रसार के साथ-साथ भिक्षुओं और भिक्षुणियों के रहने के लिए विशेष प्रकार के निवास स्थान बनाए गए, जिन्हें ‘विहार’ कहा जाता था। प्रारंभ में बौद्ध और जैन साधु वर्ष भर एक स्थान से दूसरे स्थान घूमते रहते थे और लोगों को उपदेश देते थे। केवल वर्षा ऋतु में वे किसी एक स्थान पर रुकते थे क्योंकि उस समय यात्रा करना कठिन होता था।
शुरुआत में वे प्राकृतिक गुफाओं या अस्थायी आश्रयों में रहते थे। बाद में उनके अनुयायियों और समर्थकों ने उनके लिए स्थायी निवास स्थान बनवाए जिन्हें विहार कहा गया। इसलिए विकल्प C सही है।
प्रारंभिक विहार लकड़ी के बने होते थे, लेकिन बाद में ईंटों और पत्थरों का प्रयोग होने लगा। पश्चिमी भारत में कई विहार पहाड़ियों को काटकर बनाए गए थे। कार्ले (महाराष्ट्र) की गुफाएँ इसका प्रसिद्ध उदाहरण हैं।
विकल्प A गलत है क्योंकि विहार राजाओं के महल नहीं थे। विकल्प B भी गलत है क्योंकि ये युद्ध प्रशिक्षण केंद्र नहीं थे। विकल्प D भी गलत है क्योंकि विहार व्यापारियों का संगठन नहीं था।
विहार केवल रहने का स्थान नहीं थे, बल्कि शिक्षा, ध्यान और धार्मिक गतिविधियों के महत्वपूर्ण केंद्र भी थे। यहाँ भिक्षु और भिक्षुणियाँ ध्यान करते थे, धार्मिक शिक्षा प्राप्त करते थे और लोगों को उपदेश देते थे। बाद में यही विहार बौद्ध शिक्षा और संस्कृति के प्रमुख केंद्र बन गए।
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25. निम्नलिखित में से ‘आश्रम व्यवस्था’ के संबंध में सही कथन चुनिए :
Answer: B
जब जैन और बौद्ध धर्म लोकप्रिय हो रहे थे, उसी समय ब्राह्मणों ने ‘आश्रम व्यवस्था’ का विकास किया। यहाँ ‘आश्रम’ शब्द का अर्थ रहने का स्थान नहीं बल्कि जीवन के विभिन्न चरणों से है। इस व्यवस्था के अनुसार मानव जीवन को चार भागों में विभाजित किया गया था।
ये चार आश्रम थे —
1. ब्रह्मचर्य
2. गृहस्थ
3. वानप्रस्थ
4. संन्यास
इसलिए विकल्प B सही है।
ब्रह्मचर्य आश्रम में ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य पुरुषों को सरल जीवन जीते हुए वेदों का अध्ययन करना होता था। गृहस्थ आश्रम में विवाह कर परिवार का पालन-पोषण करना होता था। वानप्रस्थ आश्रम में व्यक्ति जंगल में रहकर ध्यान और साधना करता था। अंत में संन्यास आश्रम में व्यक्ति सब कुछ त्यागकर आध्यात्मिक जीवन अपनाता था।
विकल्प A गलत है क्योंकि वेदों का अध्ययन मुख्यतः ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य पुरुषों के लिए था, शूद्रों के लिए नहीं। विकल्प C भी गलत है क्योंकि महिलाओं को सामान्यतः वेद पढ़ने की अनुमति नहीं थी और उन्हें अपने पति के चुने हुए आश्रम का पालन करना पड़ता था।
विकल्प D गलत है क्योंकि आश्रम व्यवस्था ब्राह्मणों द्वारा विकसित की गई थी, न कि बौद्ध धर्म द्वारा।
आश्रम व्यवस्था का उद्देश्य व्यक्ति के जीवन को अनुशासित और संतुलित बनाना था, ताकि वह शिक्षा, परिवार, तपस्या और त्याग — सभी का अनुभव कर सके।
Answer: