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Chapter 9 MCQs in Hindi; नए साम्राज्य और राज्य
1. गुप्त वंश के प्रसिद्ध शासक कौन था?
Answer: B
गुप्त वंश के सबसे प्रसिद्ध और शक्तिशाली शासकों में समुद्रगुप्त का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। उन्हें गुप्त साम्राज्य का महान विजेता माना जाता है। समुद्रगुप्त ने अपने सैन्य अभियानों द्वारा उत्तर भारत के अनेक राज्यों को जीतकर गुप्त साम्राज्य का विस्तार किया।
समुद्रगुप्त के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी इलाहाबाद (प्रयाग) में अशोक स्तंभ पर उत्कीर्ण अभिलेख से प्राप्त होती है। इस अभिलेख की रचना उसके दरबार के कवि और मंत्री हरिषेण ने की थी। इसमें समुद्रगुप्त की विजयों, वीरता, विद्वता और प्रशासनिक क्षमता का वर्णन किया गया है।
समुद्रगुप्त केवल एक महान योद्धा ही नहीं, बल्कि कला और साहित्य का संरक्षक भी था। उसे संगीत और काव्य में भी रुचि थी। उसके कुछ सिक्कों में उसे वीणा बजाते हुए दिखाया गया है, जिससे उसकी कलाप्रियता का पता चलता है।
इतिहासकार वी. ए. स्मिथ ने समुद्रगुप्त को उसकी विजयों के कारण “भारत का नेपोलियन” कहा है। उसके शासनकाल में गुप्त साम्राज्य की शक्ति और प्रतिष्ठा अत्यधिक बढ़ी।
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2. निम्न में से किस अभिलेख में समुद्रगुप्त के विजयों का इतिहास का विवरण मिलता है?
Answer: C
समुद्रगुप्त की विजयों और उपलब्धियों का विस्तृत वर्णन प्रयाग प्रशस्ति अभिलेख में मिलता है। यह अभिलेख इलाहाबाद (प्रयागराज) में स्थित अशोक स्तंभ पर उत्कीर्ण है।
इस प्रशस्ति की रचना समुद्रगुप्त के दरबारी कवि और मंत्री हरिषेण ने संस्कृत भाषा में की थी। इसमें समुद्रगुप्त को एक महान विजेता, कुशल प्रशासक, विद्वान तथा उदार शासक के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
प्रयाग प्रशस्ति से पता चलता है कि समुद्रगुप्त ने आर्यावर्त के अनेक राजाओं को पराजित किया तथा दक्षिण भारत तक विजय अभियान चलाया। कुछ राज्यों को उसने सीधे अपने साम्राज्य में मिला लिया, जबकि कुछ शासकों को अधीनता स्वीकार करने के बाद शासन करने की अनुमति दी।
यह अभिलेख गुप्तकालीन इतिहास का अत्यंत महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है। इससे उस समय की राजनीतिक स्थिति, सैन्य शक्ति और प्रशासनिक व्यवस्था की जानकारी मिलती है।
प्रशस्ति एक संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ “प्रशंसा” होता है। प्राचीन काल में राजाओं की उपलब्धियों और गुणों का वर्णन करने के लिए प्रशस्तियाँ लिखी जाती थीं।
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3. निम्नलिखित में से सही कथन का चयन करें :
I. इलाहाबाद प्रशस्ति अभिलेख का सम्बन्ध समुद्रगुप्त से है।
II. इस अभिलेख का रचना समुद्रगुप्त के दरबारी कवि रविकीर्ति द्वारा की गई थी।
III. प्रशस्ति एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ ‘प्रशंसा’ होता है।
IV. समुद्रगुप्त गुप्त का महान शासक था।
कूट:-
Answer: A
कथन सत्य / असत्य कारण
I. इलाहाबाद प्रशस्ति अभिलेख का सम्बन्ध समुद्रगुप्त से है। सत्य प्रयाग प्रशस्ति में समुद्रगुप्त की विजयों और उपलब्धियों का वर्णन मिलता है।
II. इस अभिलेख का रचना समुद्रगुप्त के दरबारी कवि Ravikirti द्वारा की गई थी। असत्य इस अभिलेख की रचना हरिषेण ने की थी, न कि रविकीर्ति ने।
III. प्रशस्ति एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ ‘प्रशंसा’ होता है। सत्य प्रशस्तियों में राजाओं के गुणों और विजयों का वर्णन किया जाता था।
IV. समुद्रगुप्त गुप्त वंश का महान शासक था। सत्य समुद्रगुप्त ने गुप्त साम्राज्य का विस्तार किया और उसे शक्तिशाली बनाया।
इस प्रकार केवल कथन I, III और IV सही हैं, इसलिए सही उत्तर A है।
समुद्रगुप्त के बारे में जानकारी हमें इलाहाबाद में अशोक स्तंभ पर उत्कीर्ण लंबे अभिलेख से प्राप्त होती है। इसकी रचना हरिषेण ने एक काव्य के रूप में की थी। यह अभिलेख प्रशस्ति कहलाता है।
प्रशस्तियों में राजाओं की वीरता, युद्ध कौशल, विद्वता तथा प्रशासनिक क्षमता की प्रशंसा की जाती थी। समुद्रगुप्त की प्रशस्ति में उसे एक महान योद्धा, विजेता, विद्वान और कला प्रेमी शासक बताया गया है। यहाँ तक कि उसकी तुलना देवताओं से भी की गई है।
गुप्तकाल में संस्कृत भाषा और साहित्य का विशेष विकास हुआ। प्रशस्तियाँ भी प्रायः संस्कृत में लिखी जाती थीं। प्रयाग प्रशस्ति गुप्तकालीन इतिहास का महत्वपूर्ण स्रोत मानी जाती है।
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4. निम्नलिखित में से प्रयाग प्रशस्ति अभिलेख के संदर्भ में असत्य कथन का चयन करें :-
I. इस अभिलेख में आर्यावर्त के नौ राज्यों की हारकर उन्हें अपने साम्राज्य में मिला लिया।
II. दक्षिणापथ से 18 शासक आते थे। इन सब शासकों को हरा कर समुद्रगुप्त ने अपने साम्राज्य में मिला लिया।
III. बाह्य इलाकों के शासक कुषाण तथा शक शासक समुद्रगुप्त के अधीनता स्वीकार की।
IV. पड़ोसी देश असम, तटीय बंगाल, नेपाल, और उत्तर-पश्चिम के संघ जो समुद्रगुप्त के आज्ञा का पालन करते थे।
कूट:-
Answer: B
कथन सत्य / असत्य कारण
I. इस अभिलेख में आर्यावर्त के नौ राज्यों की हारकर उन्हें अपने साम्राज्य में मिला लिया। सत्य प्रयाग प्रशस्ति में उल्लेख है कि समुद्रगुप्त ने आर्यावर्त के नौ शासकों को पराजित कर उनके राज्यों को अपने साम्राज्य में मिला लिया।
II. दक्षिणापथ से 18 शासक आते थे। इन सब शासकों को हरा कर समुद्रगुप्त ने अपने साम्राज्य में मिला लिया। असत्य दक्षिणापथ के शासकों को हराने के बाद समुद्रगुप्त ने उन्हें पुनः शासन करने की अनुमति दे दी थी, उन्हें अपने साम्राज्य में नहीं मिलाया।
III. बाह्य इलाकों के शासक कुषाण तथा शक शासक समुद्रगुप्त की अधीनता स्वीकार किए। सत्य बाहरी क्षेत्रों के अनेक शासकों ने समुद्रगुप्त की शक्ति स्वीकार की और उससे मैत्री संबंध बनाए।
IV. पड़ोसी देश असम, तटीय बंगाल, नेपाल और उत्तर-पश्चिम के संघ समुद्रगुप्त की आज्ञा का पालन करते थे। सत्य ये पड़ोसी राज्य समुद्रगुप्त को उपहार देते थे तथा उसकी अधीनता स्वीकार करते थे।
अतः केवल कथन II असत्य है, इसलिए सही उत्तर B है।
प्रयाग प्रशस्ति से समुद्रगुप्त की विजय नीति के बारे में विस्तृत जानकारी मिलती है। इसमें बताया गया है कि उसने विभिन्न क्षेत्रों के शासकों के साथ अलग-अलग प्रकार की नीति अपनाई। आर्यावर्त के राज्यों को जीतकर अपने साम्राज्य में मिला लिया गया, जबकि दक्षिण भारत के शासकों को पराजित करने के बाद पुनः शासन की अनुमति दे दी गई।
प्रशस्ति में यह भी वर्णित है कि असम, नेपाल, तटीय बंगाल तथा उत्तर-पश्चिम के कई गणराज्य समुद्रगुप्त की अधीनता स्वीकार करते थे। वे उसके दरबार में उपस्थित होकर उपहार देते थे और उसकी आज्ञा का पालन करते थे।
बाहरी क्षेत्रों के शासकों, जैसे कुषाण और शक शासकों ने भी समुद्रगुप्त की शक्ति को स्वीकार किया। इससे स्पष्ट होता है कि समुद्रगुप्त का प्रभाव भारत के बाहर तक फैला हुआ था।
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5. निम्न में से किस शासक के सिक्कों पर वीणा बजाते हुए दिखाया गया है?
Answer: D
समुद्रगुप्त के कुछ विशेष सिक्कों पर उसे वीणा बजाते हुए दर्शाया गया है। ये सिक्के इस बात का प्रमाण हैं कि वह केवल एक महान योद्धा ही नहीं, बल्कि संगीत और कला का प्रेमी भी था।
गुप्तकाल में स्वर्ण मुद्राओं का विशेष महत्व था और विभिन्न प्रकार के सिक्के जारी किए जाते थे। समुद्रगुप्त के सिक्कों में उसकी सैन्य शक्ति, धार्मिक आस्था तथा कलाप्रियता को दर्शाया गया है। वीणा बजाते हुए समुद्रगुप्त का चित्र उसके व्यक्तित्व के सांस्कृतिक पक्ष को प्रकट करता है।
इतिहासकारों के अनुसार समुद्रगुप्त एक कुशल शासक होने के साथ-साथ साहित्य और संगीत का संरक्षक भी था। उसकी प्रशस्तियों में उसे विद्वान तथा प्रतिभाशाली शासक बताया गया है।
गुप्तकाल को भारतीय इतिहास का “स्वर्ण युग” कहा जाता है। इस काल में कला, साहित्य, संगीत और स्थापत्य कला का अत्यधिक विकास हुआ। समुद्रगुप्त के सिक्के उस सांस्कृतिक उन्नति के महत्वपूर्ण प्रमाण माने जाते हैं।
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6. गुप्त वंश की कौन-से पहले शासक थे, जिन्होंने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की?
Answer: A
प्रयाग प्रशस्ति तथा अन्य अभिलेखों से ज्ञात होता है कि चन्द्रगुप्त प्रथम गुप्त वंश के पहले ऐसे शासक थे जिन्होंने “महाराजाधिराज” जैसी महत्वपूर्ण उपाधि धारण की। इससे स्पष्ट होता है कि उनके समय तक गुप्त साम्राज्य की शक्ति और प्रतिष्ठा काफी बढ़ चुकी थी।
समुद्रगुप्त की प्रशस्ति में उसके पूर्वजों का भी उल्लेख मिलता है। इसमें बताया गया है कि उसके पिता चन्द्रगुप्त प्रथम ने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की थी। वहीं उसके दादा और परदादा का उल्लेख केवल “महाराज” के रूप में किया गया है।
चन्द्रगुप्त प्रथम के शासनकाल में गुप्त साम्राज्य का विस्तार हुआ तथा लिच्छवि कुल से वैवाहिक संबंध स्थापित होने के कारण उनकी राजनीतिक शक्ति और अधिक बढ़ी। यही कारण था कि उन्होंने स्वयं को “महाराजाधिराज” की उपाधि से अलंकृत किया।
यह उपाधि उस समय अत्यंत प्रतिष्ठित मानी जाती थी और इसका प्रयोग शक्तिशाली सम्राटों द्वारा किया जाता था।
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7. निम्न में से कौन सा कथन गलत है?
Answer: B
कथन सत्य / असत्य कारण
A. 58 ईसा पूर्व में प्रारम्भ होने वाले विक्रम संवत को परंपरागत रूप से चन्द्रगुप्त द्वितीय के नाम से जोड़ा जाता है। सत्य परंपरा के अनुसार विक्रम संवत को चन्द्रगुप्त द्वितीय से जोड़ा जाता है।
B. चन्द्रगुप्त प्रथम ने शकों पर विजय के प्रतीक के रूप में शक संवत की स्थापना की। असत्य शक संवत की स्थापना चन्द्रगुप्त प्रथम ने नहीं की थी।
C. चन्द्रगुप्त द्वितीय ने शकों की विजय के उपलक्ष्य में विक्रमादित्य की उपाधि धारण की। सत्य शकों पर विजय के बाद चन्द्रगुप्त द्वितीय ने विक्रमादित्य की उपाधि धारण की।
D. चन्द्रगुप्त प्रथम ने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की थी। सत्य गुप्त वंश में महाराजाधिराज की उपाधि धारण करने वाले पहले शासक चन्द्रगुप्त प्रथम थे।
अतः कथन B गलत है, इसलिए सही उत्तर B है।
गुप्तकाल भारतीय इतिहास का अत्यंत महत्वपूर्ण काल माना जाता है। इस समय राजनीतिक स्थिरता, सांस्कृतिक विकास तथा आर्थिक समृद्धि में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। चन्द्रगुप्त प्रथम ने गुप्त साम्राज्य की शक्ति को मजबूत आधार प्रदान किया।
चन्द्रगुप्त द्वितीय ने शकों को पराजित कर पश्चिमी भारत पर अपना अधिकार स्थापित किया। इस विजय के बाद उसने “विक्रमादित्य” की उपाधि धारण की। परंपरागत रूप से विक्रम संवत को भी उसके नाम से जोड़ा जाता है।
गुप्त शासकों की उपाधियाँ उनके साम्राज्य की शक्ति और प्रतिष्ठा को दर्शाती थीं। “महाराजाधिराज” जैसी उपाधि केवल अत्यंत प्रभावशाली शासक ही धारण करते थे।
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8. निम्न में से हर्षवर्धन के दरबारी कवि कौन थे?
Answer: C
हर्षवर्धन के दरबार के प्रसिद्ध कवि और लेखक बाणभट्ट थे। उन्होंने संस्कृत भाषा में “हर्षचरित” नामक ग्रंथ की रचना की, जिसमें हर्षवर्धन के जीवन और उनके शासनकाल का वर्णन मिलता है।
बाणभट्ट गुप्तोत्तर काल के महान संस्कृत साहित्यकारों में गिने जाते हैं। वे हर्षवर्धन के दरबार में विशेष सम्मान प्राप्त विद्वान थे। उनकी रचनाओं से उस समय की सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों की जानकारी प्राप्त होती है।
हर्षवर्धन लगभग 1400 वर्ष पहले उत्तर भारत के एक शक्तिशाली शासक थे। उनके शासनकाल में शिक्षा, साहित्य और धर्म को विशेष संरक्षण मिला।
चीनी यात्री ह्वेनसांग भी हर्षवर्धन के दरबार में कुछ समय तक रहे थे, परंतु वे दरबारी कवि नहीं थे। हरिषेण समुद्रगुप्त के दरबारी कवि थे, जबकि रविकृति चालुक्य शासकों से संबंधित थे।
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9. हर्षवर्धन की जीवनी ‘हर्षचरित’ का रचना किसने किया?
Answer: C
“हर्षचरित” की रचना बाणभट्ट ने की थी। यह संस्कृत भाषा में लिखा गया एक प्रसिद्ध ग्रंथ है, जिसमें सम्राट हर्षवर्धन के जीवन, उनके परिवार तथा शासनकाल का विस्तृत वर्णन मिलता है।
बाणभट्ट हर्षवर्धन के दरबार के प्रमुख विद्वान और साहित्यकार थे। उन्होंने अपनी रचना में हर्षवर्धन की वंशावली, उनके प्रारंभिक जीवन तथा राजा बनने तक की घटनाओं का उल्लेख किया है।
हर्षचरित केवल एक जीवनी ग्रंथ ही नहीं, बल्कि उस समय की राजनीतिक और सामाजिक स्थिति को समझने का महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्रोत भी है। इससे हर्षकालीन भारत की प्रशासनिक व्यवस्था, धार्मिक स्थिति तथा सांस्कृतिक जीवन के बारे में जानकारी प्राप्त होती है।
चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी हर्षवर्धन के शासनकाल का वर्णन किया है, परंतु “हर्षचरित” के लेखक बाणभट्ट ही थे।
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10. निम्नलिखित में से हर्षवर्धन के संदर्भ में सही कथन पर विचार करें :-
I. हर्षवर्धन अपने पिता और बड़े भाई के मृत्यु हो जाने के बाद थानेश्वर के राजा बने।
II. उनके बहनोई गृहवर्मा कन्नौज के शासक थे।
III. गृहवर्मा की मृत्यु के पश्चात कन्नौज को अपने अधीन कर लिया।
IV. हर्षवर्धन ने नर्मदा नदी के पार दक्कन में चालुक्य नरेश पुलकेशिन II को हराया।
कूट:-
Answer: A
कथन सत्य / असत्य कारण
I. हर्षवर्धन अपने पिता और बड़े भाई की मृत्यु के बाद थानेश्वर के राजा बने। सत्य हर्ष अपने पिता प्रभाकरवर्धन और बड़े भाई राज्यवर्धन की मृत्यु के बाद सिंहासन पर बैठे।
II. उनके बहनोई गृहवर्मा कन्नौज के शासक थे। सत्य गृहवर्मा कन्नौज के शासक थे तथा हर्ष की बहन राज्यश्री के पति थे।
III. गृहवर्मा की मृत्यु के पश्चात हर्ष ने कन्नौज को अपने अधीन कर लिया। सत्य गृहवर्मा की मृत्यु के बाद हर्ष ने कन्नौज पर अधिकार स्थापित किया।
IV. हर्षवर्धन ने पुलकेशिन II को हराया। असत्य नर्मदा के पार दक्कन में चालुक्य शासक पुलकेशिन II ने हर्षवर्धन को आगे बढ़ने से रोक दिया था।
अतः I, II और III सही हैं, इसलिए सही उत्तर A है।
हर्षवर्धन लगभग 1400 वर्ष पहले उत्तर भारत के एक शक्तिशाली शासक थे। वे प्रारंभ में थानेश्वर के शासक बने, लेकिन बाद में कन्नौज को भी अपने साम्राज्य का केंद्र बना लिया।
हर्ष के बहनोई गृहवर्मा कन्नौज के राजा थे। बंगाल के शासक द्वारा गृहवर्मा की हत्या कर दिए जाने के बाद हर्ष ने कन्नौज पर अधिकार स्थापित किया और अपने साम्राज्य का विस्तार किया।
हर्ष ने पूर्वी भारत में काफी सफलता प्राप्त की, परंतु दक्षिण भारत में उन्हें सफलता नहीं मिली। जब उन्होंने नर्मदा नदी पार कर दक्कन की ओर बढ़ने का प्रयास किया, तब चालुक्य नरेश पुलकेशिन द्वितीय ने उन्हें रोक दिया।
हर्षवर्धन के शासनकाल में साहित्य, धर्म और शिक्षा का विशेष विकास हुआ। चीनी यात्री ह्वेनसांग भी उनके दरबार में आया था।
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11. निम्न में दक्षिण भारत के राजवंशों के बारे में असत्य कथन पर विचार करें :-
I. पल्लवों का राज्य उनकी राजधानी कांचीपुरम के आस-पास के क्षेत्रों से कावेरी नदी के डेल्टा तक फैला हुआ है।
II. चालुक्य का राज्य कृष्णा और तुंगभद्रा नदियों के बीच स्थित था।
III. चालुक्य की राजधानी कांचीपुरम थी।
कूट:-
Answer: C
कथन सत्य / असत्य कारण
I. पल्लवों का राज्य कांचीपुरम से कावेरी डेल्टा तक फैला था। सत्य पल्लवों का राज्य दक्षिण भारत में विस्तृत क्षेत्र में फैला हुआ था।
II. चालुक्य का राज्य कृष्णा और तुंगभद्रा नदियों के बीच स्थित था। सत्य चालुक्यों का राज्य दक्कन क्षेत्र में कृष्णा और तुंगभद्रा नदियों के बीच स्थित था।
III. चालुक्य की राजधानी कांचीपुरम थी। असत्य चालुक्यों की राजधानी ऐहोल थी, जबकि कांचीपुरम पल्लवों की राजधानी थी।
अतः केवल कथन III असत्य है, इसलिए सही उत्तर C है।
दक्षिण भारत में पल्लव और चालुक्य दो प्रमुख राजवंश थे। इन दोनों राज्यों के बीच लंबे समय तक संघर्ष चलता रहा और दोनों एक-दूसरे की सीमाओं पर आक्रमण करते थे।
पल्लवों की राजधानी कांचीपुरम थी, जो दक्षिण भारत का एक महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र था। पल्लवों का राज्य कावेरी नदी के डेल्टा तक फैला हुआ था।
चालुक्यों का राज्य कृष्णा और तुंगभद्रा नदियों के बीच स्थित था। उनकी राजधानी ऐहोल थी, जो व्यापार और धर्म दोनों का महत्वपूर्ण केंद्र था। बाद में यह क्षेत्र मंदिर स्थापत्य के लिए भी प्रसिद्ध हुआ।
दक्षिण भारत के इन राजवंशों ने कला, स्थापत्य और मंदिर निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
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12. निम्न में ऐहोल अभिलेख का सम्बन्ध किस शासक से है?
Answer: C
ऐहोल अभिलेख का संबंध चालुक्य शासक पुलकेशिन द्वितीय से है। यह अभिलेख उनके दरबारी कवि रविकीर्ति द्वारा रचित प्रशस्ति है, जिसमें पुलकेशिन द्वितीय की विजयों और उपलब्धियों का वर्णन मिलता है।
पुलकेशिन द्वितीय चालुक्य वंश के सबसे प्रसिद्ध शासकों में से एक थे। उनके शासनकाल में चालुक्य साम्राज्य की शक्ति और प्रतिष्ठा में काफी वृद्धि हुई।
ऐहोल चालुक्यों की एक महत्वपूर्ण राजधानी और व्यापारिक केंद्र था। धीरे-धीरे यह धार्मिक महत्व का केंद्र भी बन गया, जहाँ अनेक मंदिरों का निर्माण हुआ।
रविकीर्ति द्वारा रचित ऐहोल प्रशस्ति में पुलकेशिन द्वितीय के पूर्वजों तथा उनके सैन्य अभियानों का उल्लेख मिलता है। इसी अभिलेख से ज्ञात होता है कि उन्होंने उत्तर भारत के शक्तिशाली शासक हर्षवर्धन को नर्मदा नदी के पार आगे बढ़ने से रोक दिया था।
दक्षिण भारत के इतिहास में ऐहोल अभिलेख एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्रोत माना जाता है।
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13. ऐहोल अभिलेख प्रशस्ति को रचित ______ किया था।
Answer: C
ऐहोल अभिलेख की प्रशस्ति चालुक्य शासक पुलकेशिन द्वितीय के दरबारी कवि रविकीर्ति द्वारा रचित थी। इस प्रशस्ति में पुलकेशिन द्वितीय की विजयों, उपलब्धियों तथा उनके पूर्वजों का वर्णन मिलता है।
ऐहोल चालुक्यों की एक महत्वपूर्ण राजधानी और व्यापारिक केंद्र था। समय के साथ यह धार्मिक केंद्र के रूप में भी प्रसिद्ध हो गया, जहाँ अनेक मंदिरों का निर्माण हुआ।
रविकीर्ति संस्कृत के विद्वान कवि थे। उन्होंने अपनी प्रशस्ति में पुलकेशिन द्वितीय की शक्ति और उनके साम्राज्य के विस्तार का वर्णन किया है। इसी अभिलेख से यह भी ज्ञात होता है कि पुलकेशिन द्वितीय ने हर्षवर्धन को नर्मदा नदी के पार आगे बढ़ने से रोक दिया था।
ऐहोल अभिलेख दक्षिण भारत के इतिहास का एक महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है। इससे चालुक्य प्रशासन, युद्ध नीति और राजनीतिक स्थिति की जानकारी प्राप्त होती है।
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14. निम्नलिखित में से दक्षिण राज्य के प्रशासन के संदर्भ में कौन सा कथन असत्य है?
Answer: C
कथन सत्य / असत्य कारण
A. प्रशासन की प्राथमिक इकाई गाँव होती थी। सत्य दक्षिण भारत में गाँव प्रशासन की मुख्य इकाई थे और भूमिकर प्रमुख राजस्व स्रोत था।
B. प्रशासनिक पद आनुवंशिक होते थे। सत्य कई प्रशासनिक पद पीढ़ी दर पीढ़ी एक ही परिवार में चलते थे।
C. एक व्यक्ति एक ही पद पर कार्य करता था। असत्य कई बार एक व्यक्ति एक से अधिक प्रशासनिक पदों पर कार्य करता था।
D. स्थानीय प्रशासन में प्रमुख व्यक्तियों का प्रभाव अधिक था। सत्य स्थानीय प्रशासन में व्यापारी, शिल्पकार और प्रमुख अधिकारी प्रभावशाली भूमिका निभाते थे।
अतः कथन C असत्य है, इसलिए सही उत्तर C है।
दक्षिण भारत के प्रशासन में गाँव सबसे महत्वपूर्ण इकाई माने जाते थे। गाँवों से भूमिकर वसूला जाता था, जो राज्य की आय का प्रमुख स्रोत था।
धीरे-धीरे प्रशासन में कई परिवर्तन हुए और अनेक पद आनुवंशिक बन गए। इसका अर्थ यह था कि पिता के बाद पुत्र उसी पद को प्राप्त करता था।
कई बार एक ही व्यक्ति अनेक प्रशासनिक पदों पर कार्य करता था। उदाहरण के लिए कुछ अधिकारी न्याय, प्रशासन तथा युद्ध-संबंधी कार्य एक साथ संभालते थे।
स्थानीय प्रशासन में नगर-श्रेष्ठी, व्यापारी, शिल्पकार तथा अन्य प्रभावशाली व्यक्तियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती थी। ये लोग प्रशासनिक और आर्थिक गतिविधियों में सक्रिय भाग लेते थे।
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15. निम्न में पल्लव और चालुक्य वंश को किसने अंततः समाप्त कर दिया?
Answer: D
पल्लव और चालुक्य वंश का अंत अंततः चोल और राष्ट्रकूट शासकों द्वारा किया गया। इसलिए सही उत्तर “A और C” है।
दक्षिण भारत में पल्लव और चालुक्य लंबे समय तक शक्तिशाली राजवंश रहे। दोनों के बीच लगातार युद्ध होते रहे और वे एक-दूसरे की सीमाओं तथा राजधानियों पर आक्रमण करते थे।
समय के साथ दक्षिण भारत में नए शक्तिशाली राजवंश उभरे। राष्ट्रकूटों ने चालुक्यों की शक्ति को कमजोर किया, जबकि चोलों ने पल्लवों के प्रभाव को समाप्त कर दिया।
चोल वंश बाद में दक्षिण भारत का अत्यंत शक्तिशाली साम्राज्य बना। उन्होंने समुद्री व्यापार, प्रशासन और मंदिर निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
राष्ट्रकूटों ने भी दक्कन क्षेत्र में अपना प्रभाव स्थापित किया और कला, साहित्य तथा स्थापत्य को संरक्षण दिया।
CLASS-6 CHAPTER-9 PAGE NO.-92
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16. ब्राह्मण भू-स्वामियों का संगठन ______ कहलाता था?
Answer: C
पल्लव काल में ब्राह्मण भू-स्वामियों के संगठन को “सभा” कहा जाता था। यह स्थानीय प्रशासन की एक महत्वपूर्ण संस्था थी।
सभा स्थानीय स्तर पर विभिन्न कार्यों का संचालन करती थी। इसके अंतर्गत सिंचाई व्यवस्था, खेती से जुड़े कार्य, सड़क निर्माण तथा मंदिरों की देखरेख जैसे कार्य शामिल थे।
इन सभाओं में मुख्य रूप से ब्राह्मण भू-स्वामी भाग लेते थे। वे उप-समितियों के माध्यम से प्रशासनिक और आर्थिक कार्यों का संचालन करते थे।
दक्षिण भारत में स्थानीय प्रशासन काफी विकसित था और गाँवों की प्रशासनिक व्यवस्था में इन सभाओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती थी।
पल्लवों के अभिलेखों में ऐसी अनेक स्थानीय संस्थाओं का उल्लेख मिलता है, जो उस समय की उन्नत प्रशासनिक व्यवस्था को दर्शाती हैं।
CLASS-6 CHAPTER-9 PAGE NO.-93
17. निम्न में से व्यापारियों के संगठन का क्या नाम है?
Answer: B
दक्षिण भारत में अनेक प्रकार की स्थानीय सभाएँ और संगठन कार्य करते थे। इनमें व्यापारियों का एक प्रमुख संगठन “नगरम” कहलाता था। यह व्यापारियों का संगठन था, जो व्यापारिक गतिविधियों, वस्तुओं के आदान-प्रदान तथा आर्थिक व्यवस्था से जुड़े कार्यों को संचालित करता था।
पल्लवों के अभिलेखों में विभिन्न स्थानीय सभाओं का उल्लेख मिलता है। इनमें ब्राह्मण भू-स्वामियों का संगठन “सभा” कहलाता था, जबकि व्यापारियों के संगठन को “नगरम” कहा जाता था।
संभवतः इन संगठनों पर धनी भू-स्वामियों और बड़े व्यापारियों का नियंत्रण रहता था। ये संस्थाएँ केवल व्यापार तक सीमित नहीं थीं, बल्कि स्थानीय प्रशासन और आर्थिक गतिविधियों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं।
इनमें से कई स्थानीय सभाएँ और संगठन सैकड़ों वर्षों तक कार्य करते रहे, जिससे पता चलता है कि दक्षिण भारत में स्थानीय प्रशासन काफी विकसित था।
CLASS-6 CHAPTER-9 PAGE NO.-93
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18. निम्न में से प्रसिद्ध नाटक अभिज्ञान-शाकुन्तलम् के रचनाकार कौन थे?
Answer: A
महाकवि कालिदास संस्कृत साहित्य के महान रचनाकार माने जाते हैं। वे अपने नाटकों और काव्यों में राजदरबार, प्रकृति, समाज तथा मानवीय भावनाओं के अत्यंत सुंदर चित्रण के लिए प्रसिद्ध थे।
कालिदास के नाटकों की एक विशेषता यह थी कि उनमें राजा और अधिकांश ब्राह्मण पात्र संस्कृत भाषा बोलते हुए दिखाए गए हैं, जबकि सामान्य लोग और महिलाएँ प्राकृत भाषा का प्रयोग करते थे। इससे उस समय की सामाजिक और भाषाई व्यवस्था की जानकारी मिलती है।
कालिदास की सबसे प्रसिद्ध रचनाओं में “अभिज्ञान-शाकुन्तलम्” प्रमुख है। यह नाटक राजा दुष्यंत और शकुंतला की प्रेमकथा पर आधारित है। इसमें केवल प्रेमकथा ही नहीं, बल्कि तत्कालीन समाज, राजदरबार तथा प्रशासनिक व्यवस्था का भी चित्रण मिलता है।
इस नाटक में गरीब मछुआरों और राजकर्मचारियों के बीच होने वाले दुर्व्यवहार का भी उल्लेख मिलता है, जिससे उस समय की सामाजिक परिस्थितियों की झलक मिलती है।
इस प्रकार “अभिज्ञान-शाकुन्तलम्” के रचनाकार कालिदास थे।
CLASS-6 CHAPTER-9 PAGE NO.-94
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19. निम्नलिखित में से प्रसिद्ध पुस्तक अभिज्ञान-शाकुन्तलम् में किस की कहानी मिलती है?
Answer: D
“अभिज्ञान-शाकुन्तलम्” संस्कृत साहित्य का एक अत्यंत प्रसिद्ध नाटक है, जिसकी रचना महाकवि कालिदास ने की थी। यह नाटक राजा दुष्यंत और शकुंतला की प्रेमकथा पर आधारित है।
कहानी के अनुसार राजा दुष्यंत वन में जाते हैं, जहाँ उनकी भेंट शकुंतला से होती है। दोनों एक-दूसरे से प्रेम करने लगते हैं। बाद में अनेक घटनाएँ घटती हैं, जिनमें वियोग और पुनर्मिलन का वर्णन मिलता है।
इस नाटक में तत्कालीन समाज, राजदरबार, राजकर्मचारियों तथा सामान्य लोगों के जीवन का भी सुंदर चित्रण किया गया है। कालिदास ने मानवीय भावनाओं और प्रकृति का अत्यंत प्रभावशाली वर्णन किया है।
चूँकि इस नाटक में राजा दुष्यंत और शकुंतला दोनों की कहानी का वर्णन मिलता है, इसलिए सही उत्तर “B और C” है।
CLASS-6 CHAPTER-9 PAGE NO.-94
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20. ग्राम-वासी राजा के लिए क्या-क्या लेकर आते थे?
Answer: D
प्राचीन समय में जब राजा अपने राज्य का भ्रमण करते थे, तब मार्ग में पड़ने वाले गाँवों के लोग उनका सम्मान और स्वागत करते थे। ग्रामवासी राजा के लिए दही, गुड़ तथा फूलों के उपहार लेकर आते थे।
केवल उपहार ही नहीं, बल्कि वे राजा और उनके साथ आने वाले सैनिकों तथा जानवरों के लिए भोजन और चारे की भी व्यवस्था करते थे। यह उस समय की परंपरा और राजभक्ति का प्रतीक माना जाता था।
ग्रामवासी राजा से मिलना भी चाहते थे ताकि वे अपनी शिकायतें, समस्याएँ और अनुरोध सीधे उनके सामने रख सकें। इससे राजा को अपने राज्य की परिस्थितियों की जानकारी मिलती थी और जनता को भी अपनी बात कहने का अवसर मिलता था।
इस प्रकार दही, गुड़ और फूलों के उपहार सभी ग्रामवासियों द्वारा राजा के लिए लाए जाते थे, इसलिए सही उत्तर “उपरोक्त सभी” है।
CLASS-6 CHAPTER-9 PAGE NO.-95
21. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए :
I. समुद्रगुप्त के बारे में जानकारी इलाहाबाद स्तंभ अभिलेख से प्राप्त होती है।
II. हरिषेण समुद्रगुप्त के दरबारी कवि और मंत्री थे।
III. प्रशस्ति का अर्थ ‘प्रशंसा’ होता है।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए :
Answer: D
गुप्तकाल भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण काल माना जाता है। इस काल में समुद्रगुप्त सबसे प्रसिद्ध शासकों में से एक थे। उनके बारे में महत्वपूर्ण जानकारी इलाहाबाद के अशोक स्तंभ पर उत्कीर्ण अभिलेख से प्राप्त होती है। इस अभिलेख की रचना हरिषेण ने की थी, जो समुद्रगुप्त के दरबार में कवि और मंत्री दोनों थे।
कथन I सही है क्योंकि इलाहाबाद स्तंभ अभिलेख समुद्रगुप्त के जीवन, विजयों और प्रशासन के बारे में प्रमुख स्रोत माना जाता है। इस अभिलेख में उनके सैन्य अभियानों, राजनीतिक नीतियों तथा व्यक्तित्व का विस्तृत वर्णन मिलता है।
कथन II भी सही है। हरिषेण केवल कवि ही नहीं बल्कि मंत्री भी थे। उन्होंने संस्कृत भाषा में समुद्रगुप्त की प्रशंसा में एक लंबी प्रशस्ति की रचना की। इससे पता चलता है कि गुप्तकाल में साहित्य और राजनीति का घनिष्ठ संबंध था।
कथन III भी सही है क्योंकि ‘प्रशस्ति’ संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ ‘प्रशंसा’ होता है। प्रशस्तियों में राजा के गुणों, विजयों और वीरता का बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन किया जाता था। गुप्तकाल में प्रशस्ति लेखन का महत्व बहुत बढ़ गया था। समुद्रगुप्त को महान योद्धा, विद्वान और कवि के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
समुद्रगुप्त की प्रशस्ति से यह भी पता चलता है कि उस समय राजा केवल युद्ध कौशल के लिए ही प्रसिद्ध नहीं होते थे, बल्कि संगीत, साहित्य और कला में दक्ष होना भी महत्वपूर्ण माना जाता था। समुद्रगुप्त को वीणा बजाते हुए सिक्कों पर भी दर्शाया गया है। इससे गुप्तकालीन सांस्कृतिक उन्नति का पता चलता है।
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22. निम्नलिखित का सुमेल कीजिए :
सूची-I सूची-II
1. आर्यावर्त a. व्यापारियों का संगठन
2. दक्षिणापथ b. समुद्रगुप्त द्वारा पराजित 12 शासक
3. नगरम c. समुद्रगुप्त द्वारा पराजित 9 शासक
4. सभा d. ब्राह्मण भू-स्वामियों का संगठन
कूट :
Answer: A
समुद्रगुप्त की प्रशस्ति से उनके साम्राज्य विस्तार और विभिन्न क्षेत्रों के शासकों के साथ संबंधों की जानकारी मिलती है। हरिषेण ने चार प्रकार के शासकों और उनके प्रति समुद्रगुप्त की नीतियों का वर्णन किया है।
1. आर्यावर्त — समुद्रगुप्त द्वारा पराजित 9 शासक
आर्यावर्त उत्तर भारत का क्षेत्र था। यहाँ के नौ शासकों को समुद्रगुप्त ने पराजित कर उनके राज्यों को अपने साम्राज्य में मिला लिया था। इससे उनकी प्रत्यक्ष साम्राज्यवादी नीति का पता चलता है।
2. दक्षिणापथ — समुद्रगुप्त द्वारा पराजित 12 शासक
दक्षिणापथ दक्षिण भारत का क्षेत्र था। समुद्रगुप्त ने यहाँ के बारह शासकों को हराया, लेकिन उनके राज्यों को अपने साम्राज्य में नहीं मिलाया। उन्हें पुनः शासन करने की अनुमति दे दी गई। यह नीति राजनीतिक समझदारी को दर्शाती है क्योंकि दूरस्थ क्षेत्रों पर प्रत्यक्ष नियंत्रण कठिन था।
3. नगरम — व्यापारियों का संगठन
दक्षिण भारत में स्थानीय प्रशासन में व्यापारियों की महत्वपूर्ण भूमिका थी। ‘नगरम’ व्यापारियों का संगठन था, जो व्यापार और आर्थिक गतिविधियों को नियंत्रित करता था। यह संगठन स्थानीय प्रशासन और व्यापारिक व्यवस्था में प्रभावशाली माना जाता था।
4. सभा — ब्राह्मण भू-स्वामियों का संगठन
‘सभा’ दक्षिण भारत में ब्राह्मण भू-स्वामियों की स्थानीय संस्था थी। यह सिंचाई, कृषि, सड़क निर्माण और मंदिरों की देखरेख जैसे कार्य करती थी। इससे पता चलता है कि स्थानीय प्रशासन काफी संगठित था।
इन संस्थाओं से स्पष्ट होता है कि गुप्तकाल और दक्षिण भारतीय राज्यों में प्रशासन केवल राजा तक सीमित नहीं था, बल्कि स्थानीय संगठनों की भी महत्वपूर्ण भूमिका थी। इससे प्रशासनिक व्यवस्था अधिक प्रभावी बनती थी।
23. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए :
I. हर्षवर्धन थानेसर के शासक बने थे।
II. हर्षवर्धन ने कन्नौज को अपने अधीन कर लिया था।
III. हर्षवर्धन को नर्मदा नदी के पास पुलकेशिन द्वितीय ने रोका था।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए :
Answer: D
हर्षवर्धन प्राचीन भारत के महत्वपूर्ण शासकों में से एक थे। उनके बारे में जानकारी मुख्यतः बाणभट्ट द्वारा रचित ‘हर्षचरित’ तथा चीनी यात्री ह्वेनसांग (श्वेन त्सांग) के विवरण से प्राप्त होती है। हर्षवर्धन पुष्यभूति वंश के शासक थे और लगभग 1400 वर्ष पहले उन्होंने शासन किया।
कथन I सही है क्योंकि हर्षवर्धन अपने पिता के सबसे बड़े पुत्र नहीं थे, लेकिन पिता और बड़े भाई की मृत्यु के बाद वे थानेसर के राजा बने। इससे स्पष्ट होता है कि तत्कालीन राजवंशों में उत्तराधिकार हमेशा ज्येष्ठ पुत्र को ही नहीं मिलता था, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार सत्ता परिवर्तन होता था।
कथन II भी सही है। हर्षवर्धन के बहनोई कन्नौज के शासक थे। जब बंगाल के शासक ने उनके बहनोई की हत्या कर दी, तब हर्ष ने कन्नौज पर अधिकार कर लिया और बाद में बंगाल के विरुद्ध अभियान चलाया। इससे उनकी साम्राज्य विस्तार की नीति स्पष्ट होती है।
कथन III भी सही है। हर्षवर्धन ने उत्तर भारत में काफी सफलता प्राप्त की, परंतु जब उन्होंने नर्मदा नदी पार कर दक्षिण भारत की ओर बढ़ने का प्रयास किया, तब चालुक्य शासक पुलकेशिन द्वितीय ने उन्हें रोक दिया। यह घटना उत्तर और दक्षिण भारत की दो शक्तियों के संघर्ष का महत्वपूर्ण उदाहरण मानी जाती है।
पुलकेशिन द्वितीय चालुक्य वंश का सबसे प्रसिद्ध शासक था। उसकी प्रशस्ति रविकीर्ति ने लिखी थी। इस प्रशस्ति में पुलकेशिन की विजयों तथा हर्षवर्धन पर उसकी सफलता का वर्णन मिलता है। इस घटना से यह भी स्पष्ट होता है कि उस समय दक्षिण भारत के राज्य भी अत्यंत शक्तिशाली थे और उत्तर भारतीय शासकों को चुनौती देने में सक्षम थे।
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24. निम्नलिखित का सुमेल कीजिए :
सूची-I सूची-II
1. हरिषेण a. हर्षचरित
2. बाणभट्ट b. पुलकेशिन द्वितीय की प्रशस्ति
3. रविकीर्ति c. समुद्रगुप्त की प्रशस्ति
4. हर्षचरित d. हर्षवर्धन की जीवनी
कूट :
Answer: A
प्राचीन भारतीय इतिहास में अभिलेख, प्रशस्तियाँ और जीवनियाँ महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्रोत माने जाते हैं। इनके माध्यम से तत्कालीन राजाओं, प्रशासन, युद्धों तथा समाज के बारे में जानकारी प्राप्त होती है।
1. हरिषेण — समुद्रगुप्त की प्रशस्ति
हरिषेण समुद्रगुप्त के दरबार में कवि और मंत्री थे। उन्होंने इलाहाबाद स्तंभ पर समुद्रगुप्त की प्रसिद्ध प्रशस्ति लिखी। इस प्रशस्ति में समुद्रगुप्त की विजयों, वीरता और व्यक्तित्व का वर्णन मिलता है।
2. बाणभट्ट — हर्षचरित
बाणभट्ट हर्षवर्धन के दरबारी कवि थे। उन्होंने संस्कृत भाषा में ‘हर्षचरित’ नामक ग्रंथ की रचना की, जो हर्षवर्धन की जीवनी मानी जाती है। इसमें हर्ष की वंशावली तथा उनके राजा बनने तक की घटनाओं का वर्णन मिलता है।
3. रविकीर्ति — पुलकेशिन द्वितीय की प्रशस्ति
रविकीर्ति चालुक्य राजा पुलकेशिन द्वितीय के दरबारी कवि थे। उन्होंने पुलकेशिन की प्रशस्ति लिखी, जिसमें उसकी विजयों तथा हर्षवर्धन को रोकने की घटना का वर्णन है।
4. हर्षचरित — हर्षवर्धन की जीवनी
‘हर्षचरित’ केवल साहित्यिक कृति ही नहीं बल्कि ऐतिहासिक स्रोत भी है। इससे हर्षवर्धन के शासन, परिवार और राजनीतिक घटनाओं की जानकारी मिलती है।
इन रचनाओं से यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारत में कवियों और लेखकों का राजदरबार में महत्वपूर्ण स्थान था। वे केवल साहित्य सृजन ही नहीं करते थे, बल्कि शासकों की उपलब्धियों को भी सुरक्षित रखते थे। इतिहास लेखन में इन स्रोतों का विशेष महत्व है।
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25. एकाश्म (Monolith) मंदिरों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए :
I. इन्हें एक ही विशाल चट्टान को तराशकर बनाया जाता था।
II. इन मंदिरों का निर्माण नीचे से ऊपर की ओर किया जाता था।
III. ये ईंटों से बने मंदिरों से भिन्न होते थे।
नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए :
Answer: C
प्राचीन भारत की स्थापत्य कला विश्वभर में प्रसिद्ध रही है। इस काल में अनेक गुफा मंदिर और चट्टानों को काटकर बनाए गए मंदिरों का निर्माण हुआ। ऐसे मंदिरों को ‘एकाश्म’ या Monolith कहा जाता है। ‘एकाश्म’ का अर्थ है — एक ही पत्थर या विशाल चट्टान से निर्मित संरचना।
कथन I सही है क्योंकि एकाश्म मंदिरों को एक ही विशाल पहाड़ी या चट्टान को तराशकर बनाया जाता था। इन मंदिरों में अलग-अलग पत्थरों को जोड़ने की आवश्यकता नहीं होती थी। पूरा मंदिर एक ही चट्टान से निर्मित होता था।
कथन II गलत है। ईंटों से बने मंदिरों का निर्माण नीचे से ऊपर की ओर किया जाता था, लेकिन चट्टानों को काटकर बनाए जाने वाले मंदिर ऊपर से नीचे की दिशा में बनाए जाते थे। पत्थर काटने वाले पहले ऊपरी भाग को तराशते थे और धीरे-धीरे नीचे की ओर बढ़ते थे। यह कार्य अत्यंत कठिन और तकनीकी कौशल से भरपूर होता था।
कथन III सही है क्योंकि एकाश्म मंदिर ईंटों से बने मंदिरों से पूरी तरह भिन्न थे। ईंटों के मंदिरों में एक-एक परत जोड़कर निर्माण किया जाता था, जबकि एकाश्म मंदिरों में एक ही चट्टान को काटकर संपूर्ण संरचना तैयार की जाती थी। इससे भारतीय शिल्पकारों की अद्भुत तकनीकी दक्षता का पता चलता है।
ऐसे मंदिरों के निर्माण में शिल्पकारों को कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ता होगा। उन्हें चट्टान की मजबूती, आकार, संतुलन तथा डिजाइन का अत्यंत सावधानी से ध्यान रखना पड़ता था। थोड़ी-सी गलती भी पूरे मंदिर को नुकसान पहुँचा सकती थी। इसलिए यह कार्य वर्षों की मेहनत और उच्च कोटि की कला का उदाहरण माना जाता है।