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Chapter 8 MCQs in Hindi; गाँव, शहर और व्यापार
1. भारतीय उपमहाद्वीप में लोहे का प्रयोग लगभग कितने वर्ष पूर्व हुआ?
Answer: C
भारतीय उपमहाद्वीप में लोहे का प्रयोग लगभग 3000 वर्ष पूर्व प्रारम्भ हुआ। प्रारंभिक काल में लोहे का उपयोग मुख्य रूप से औजार और हथियार बनाने में किया जाता था। महापाषाण कालीन कब्रों से लोहे के अनेक उपकरण प्राप्त हुए हैं, जिनसे यह सिद्ध होता है कि उस समय लोहे का व्यापक उपयोग होने लगा था।
लोहे के उपयोग से कृषि कार्य में बड़ी प्रगति हुई। लोहे के फाल वाले हलों से कठोर भूमि की जुताई संभव हुई, जिससे कृषि उत्पादन बढ़ा। जंगलों को साफ करने के लिए लोहे की कुल्हाड़ियों का उपयोग किया गया, जिसके कारण नई बस्तियाँ और कृषि क्षेत्र विकसित हुए।
इतिहासकारों के अनुसार गंगा घाटी के घने जंगलों को साफ करने में लोहे के औजारों की महत्वपूर्ण भूमिका थी। इससे उत्तर भारत में कृषि आधारित समाज और बड़े राज्यों का विकास संभव हुआ।
भारत में लोहे के प्राचीन अवशेष उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और दक्षिण भारत के कई क्षेत्रों से प्राप्त हुए हैं।
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2. 2500 वर्ष पहले प्रयोग किये जाने वाले लोहे के औजारों में क्या शामिल थे?
Answer: C
लगभग 2500 वर्ष पूर्व लोहे के औजारों का व्यापक उपयोग होने लगा था। इनमें हल के फाल तथा कुल्हाड़ियाँ प्रमुख थीं।
लोहे की कुल्हाड़ियों का उपयोग जंगलों को काटने और कृषि योग्य भूमि तैयार करने के लिए किया जाता था। इससे खेती के क्षेत्र में विस्तार हुआ और नई बस्तियाँ बसाई गईं।
हल के लोहे के फाल कृषि के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण थे। इनकी सहायता से कठोर भूमि को आसानी से जोता जा सकता था। इससे कृषि उत्पादन में वृद्धि हुई और किसानों की उत्पादन क्षमता बढ़ी।
लोहे के औजारों के कारण कृषि अधिशेष बढ़ा, जिससे व्यापार, नगरों और राज्यों का विकास संभव हुआ। इसी काल में महाजनपदों और बड़े राज्यों का उदय भी देखने को मिलता है।
महापाषाण संस्कृति से प्राप्त कब्रों में लोहे के हथियार, भाले, चाकू और कृषि उपकरण भी मिले हैं, जो उस समय की तकनीकी प्रगति को दर्शाते हैं।
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3. निम्नलिखित में सही कथन का चयन करें:-
I. तमिल क्षेत्र में बड़े भू-स्वामियों को वेल्लाला कहा जाता है।
II. तमिल क्षेत्र में भूमिहीन मजदूरों को अदिमई कहलाते हैं।
III. तमिल क्षेत्र में साधारण हलवाहों को दास कड़ेसियार कहा जाता है।
कूट:-
Answer: B
प्राचीन तमिल क्षेत्र के समाज में विभिन्न वर्गों के लोगों का उल्लेख संगम साहित्य में मिलता है। बड़े भू-स्वामियों को ‘वेल्लाला’ कहा जाता था। ये समाज के समृद्ध और प्रभावशाली वर्ग में शामिल थे तथा इनके पास बड़ी मात्रा में कृषि भूमि होती थी।
भूमिहीन मजदूरों और आश्रित श्रमिकों को ‘अदिमई’ कहा जाता था। ये लोग कृषि कार्यों तथा अन्य श्रम कार्यों में लगे रहते थे।
साधारण हलवाहों को ‘उझावर’ कहा जाता था, जबकि ‘कड़ेसियार’ शब्द का प्रयोग भूमिहीन मजदूरों और निम्न वर्ग के श्रमिकों के लिए किया जाता था। इसलिए कथन III गलत है।
संगम साहित्य से दक्षिण भारत के सामाजिक जीवन, व्यापार, कृषि और प्रशासन की महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है। यह प्रारंभिक तमिल साहित्य माना जाता है।
चोल, चेर और पाण्ड्य राज्यों के समय कृषि, पशुपालन और समुद्री व्यापार दक्षिण भारत की अर्थव्यवस्था के प्रमुख आधार थे।
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4. भारत के उत्तरी गाँव क्षेत्र के गाँव के प्रधान को ________ कहा जाता है?
Answer: C
प्राचीन उत्तर भारत के गाँवों में गाँव के प्रधान को ‘ग्राम-भोजक’ कहा जाता था। यह गाँव का प्रमुख व्यक्ति होता था और प्रशासनिक तथा राजस्व संबंधी कार्यों की देखरेख करता था।
ग्राम-भोजक सामान्यतः गाँव के सबसे बड़े भू-स्वामी होते थे। इनके पास पर्याप्त कृषि भूमि और आर्थिक शक्ति होती थी। कई बार यह पद एक ही परिवार में पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता था, इसलिए इसे आनुवंशिक पद भी माना जाता है।
ग्राम-भोजक कर संग्रह में राज्य की सहायता करते थे। वे किसानों से कर वसूलकर राज्य तक पहुँचाते थे तथा गाँव में कानून-व्यवस्था बनाए रखने में भी भूमिका निभाते थे।
प्राचीन भारतीय गाँव आत्मनिर्भर होते थे। गाँवों में किसान, लोहार, बढ़ई, कुम्हार और बुनकर जैसे अनेक कारीगर रहते थे, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार थे।
बौद्ध ग्रंथों और जातक कथाओं से उस समय के ग्रामीण जीवन, कृषि व्यवस्था और ग्राम प्रशासन की महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।
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5. निम्नलिखित कथनों में असत्य कथन को लिखें?
Answer: B
प्राचीन उत्तर भारत में गाँव के प्रधान को ‘ग्राम-भोजक’ कहा जाता था। यह व्यक्ति सामान्यतः गाँव का सबसे बड़ा भू-स्वामी और प्रभावशाली व्यक्ति होता था।
ग्राम-भोजक का पद प्रायः आनुवंशिक होता था, अर्थात एक ही परिवार के लोग कई पीढ़ियों तक इस पद पर बने रहते थे। इसलिए कथन B असत्य है।
ग्राम-भोजक गाँव में कर वसूली का कार्य भी करता था। राजा द्वारा कर संग्रह की जिम्मेदारी अक्सर इन्हें ही सौंपी जाती थी। इसके अतिरिक्त ये न्यायिक कार्य तथा कभी-कभी पुलिस संबंधी कार्य भी करते थे।
ग्राम-भोजकों की भूमि पर दास और मजदूर कार्य करते थे। ग्रामीण प्रशासन में इनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती थी।
बौद्ध जातक कथाओं और प्राचीन ग्रंथों से ग्राम-भोजकों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति की जानकारी प्राप्त होती है।
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6. उत्तर भारत स्वतंत्र कृषक को ______ कहा जाता है?
Answer: A
प्राचीन उत्तर भारत में स्वतंत्र कृषकों को ‘गृहपति’ कहा जाता था। ये स्वतंत्र किसान होते थे और अपनी भूमि पर स्वयं खेती करते थे।
गृहपति सामान्यतः छोटे किसान होते थे, जिनके पास अपनी कृषि भूमि होती थी। ये ग्रामीण अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण अंग थे और कृषि उत्पादन में प्रमुख भूमिका निभाते थे।
‘अदिमई’ शब्द भूमिहीन मजदूरों और आश्रित श्रमिकों के लिए प्रयोग किया जाता था, जबकि ‘वेल्लाला’ तमिल क्षेत्र के बड़े भू-स्वामियों को कहा जाता था। ‘उझावर’ साधारण हलवाहों के लिए प्रयुक्त शब्द था।
बौद्ध ग्रंथों में गृहपति शब्द का उपयोग सम्मानित ग्रामीण गृहस्थों और कृषकों के लिए भी किया गया है।
कृषि उस समय भारतीय अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार थी, इसलिए गृहपतियों का समाज में विशेष महत्व था।
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7. तमिल की प्राचीनतम रचनाओं को ________ कहा जाता है?
Answer: A
तमिल भाषा की प्राचीनतम रचनाओं को ‘संगम साहित्य’ कहा जाता है। इनकी रचना लगभग 2300 वर्ष पूर्व की गई थी।
‘संगम’ शब्द का अर्थ कवियों की सभा या सम्मेलन होता है। माना जाता है कि मदुरै में कवियों के सम्मेलनों में इन रचनाओं का संकलन किया गया था, इसलिए इन्हें संगम साहित्य कहा गया।
संगम साहित्य से दक्षिण भारत के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक जीवन की महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है। इसमें चोल, चेर और पाण्ड्य राज्यों का वर्णन मिलता है।
इन ग्रंथों में व्यापार, कृषि, युद्ध, प्रेम, समुद्री गतिविधियों तथा ग्रामीण जीवन का विस्तृत वर्णन मिलता है। दक्षिण भारत के प्राचीन इतिहास के अध्ययन के लिए संगम साहित्य अत्यंत महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है।
संगम साहित्य की प्रमुख रचनाओं में ‘एट्टुतोकई’, ‘पट्टुपट्टु’ और ‘तोल्काप्पियम’ शामिल हैं।
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8. तांबे के सिक्कों पर विभिन्न आकृतियों को ठप्पे से बनाये जाने के कारण ______ कहा जाता है?
Answer: B
प्राचीन भारत में तांबे तथा चाँदी के जिन सिक्कों पर विभिन्न चिन्ह ठप्पे द्वारा बनाए जाते थे, उन्हें ‘आहत सिक्के’ कहा जाता था।
ये सिक्के सामान्यतः आयताकार, वर्गाकार अथवा गोल आकार के होते थे। इन्हें धातु की चादरों को काटकर या धातु के चपटे टुकड़ों से तैयार किया जाता था। इन सिक्कों पर कोई लेख नहीं होता था, बल्कि विभिन्न प्रतीकों और आकृतियों को ठप्पों की सहायता से अंकित किया जाता था।
आहत सिक्के भारतीय उपमहाद्वीप के अनेक भागों में पाए गए हैं और इनका प्रचलन ईसा की प्रारंभिक सदियों तक रहा। इन्हें प्राचीन भारत की मुद्रा व्यवस्था का महत्वपूर्ण भाग माना जाता है।
इतिहासकारों के अनुसार ये सिक्के व्यापार और कर संग्रह की व्यवस्था को सुगम बनाने में सहायक थे। प्राचीन महाजनपदों और मौर्यकाल में इनका व्यापक उपयोग हुआ।
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9. मथुरा नगर किसके लिए प्रसिद्ध है?
Answer: D
मथुरा प्राचीन भारत का एक अत्यंत महत्वपूर्ण नगर था। यह यातायात, व्यापार तथा मूर्तिकला—तीनों के लिए प्रसिद्ध था।
मथुरा लगभग 2500 वर्षों से अधिक समय से महत्वपूर्ण नगर रहा है क्योंकि यह व्यापार और यातायात के प्रमुख मार्गों पर स्थित था। एक मार्ग उत्तर-पश्चिम से पूर्व की ओर जाता था तथा दूसरा उत्तर से दक्षिण भारत की ओर। इस कारण यह नगर व्यापारिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बन गया।
मथुरा मूर्तियाँ बनाने के लिए भी प्रसिद्ध था। यहाँ उत्कृष्ट मूर्तिकला का विकास हुआ और यह कुषाण काल में मूर्तिकला का प्रमुख केंद्र बना। विशेष रूप से लाल बलुआ पत्थर की मूर्तियों के लिए मथुरा प्रसिद्ध था।
यह नगर धार्मिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण था। यहाँ बौद्ध विहार, जैन मंदिर तथा बाद में कृष्ण भक्ति से जुड़े केंद्र विकसित हुए। आसपास के किसान और पशुपालक नगरवासियों के लिए खाद्यान्न उपलब्ध कराते थे।
मथुरा के अभिलेखों में सुनारों, बुनकरों, लुहारों, टोकरी बनाने वालों, माला बनाने वालों तथा अन्य शिल्पकारों का उल्लेख मिलता है, जिससे इसकी आर्थिक समृद्धि का पता चलता है।
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10. निम्नलिखित में से मथुरा नगर के गतिविधियों का केंद्र होने का क्या कारण है?
I. मथुरा एक धार्मिक केंद्र रहा है। यहाँ बौद्ध विहार और जैन मंदिर हैं।
II. यह मूर्तियाँ बनाने के भी केंद्र था।
III. मथुरा कुषाणों की पहली राजधानी थी।
IV. मथुरा अभिलेख में सुनारों, बुनकरों, लुहारों, टोकरी बुनने वाला, माला बनाने वाला और इत्र बनाने वाले का उल्लेख मिलता है।
कूट:-
Answer: C
मथुरा प्राचीन भारत में अनेक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र था। यह धार्मिक, व्यापारिक तथा शिल्प गतिविधियों के कारण अत्यंत महत्वपूर्ण नगर बन गया।
कथन I सही है क्योंकि मथुरा एक प्रमुख धार्मिक केंद्र था। यहाँ बौद्ध विहार, जैन मंदिर तथा बाद में वैष्णव धर्म से जुड़े धार्मिक स्थल विकसित हुए।
कथन II भी सही है क्योंकि मथुरा उत्कृष्ट मूर्तियाँ बनाने का प्रमुख केंद्र था। मथुरा शैली की मूर्तिकला भारतीय कला इतिहास में विशेष स्थान रखती है। यहाँ बुद्ध, जैन तीर्थंकरों तथा हिंदू देवी-देवताओं की अनेक मूर्तियाँ बनाई गईं।
कथन III गलत है क्योंकि मथुरा कुषाणों की पहली नहीं बल्कि दूसरी राजधानी थी। कुषाणों की प्रमुख राजधानी पुरुषपुर (वर्तमान पेशावर) मानी जाती है।
कथन IV सही है। मथुरा के अभिलेखों में विभिन्न शिल्पकारों और व्यवसायियों—जैसे सुनार, लुहार, बुनकर, टोकरी बुनने वाले, माला बनाने वाले तथा इत्र बनाने वालों—का उल्लेख मिलता है। इससे पता चलता है कि यहाँ व्यापार और उद्योग अत्यधिक विकसित थे।
मथुरा उत्तर भारत के प्रमुख व्यापारिक मार्गों पर स्थित होने के कारण भी आर्थिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र बना।
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11. शिल्पकारों और व्यापारियों के संघ को क्या कहा जाता था?
Answer: B
प्राचीन भारत में शिल्पकारों और व्यापारियों के संघ को ‘श्रेणी’ कहा जाता था। समान कार्य करने वाले कारीगर और व्यापारी अपने-अपने संगठन बनाते थे, जिन्हें श्रेणी कहा जाता था।
शिल्पकारों की श्रेणियों का कार्य प्रशिक्षण देना, कच्चा माल उपलब्ध कराना तथा तैयार माल का वितरण करना था। दूसरी ओर व्यापारियों की श्रेणियाँ व्यापार के संचालन और वस्तुओं के विनिमय का कार्य करती थीं।
श्रेणियाँ आर्थिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण भाग थीं। कई श्रेणियाँ बैंक की तरह भी कार्य करती थीं, जहाँ लोग अपना धन जमा रखते थे।
मौर्य तथा उत्तर-मौर्य काल में श्रेणियों का प्रभाव काफी बढ़ गया था। विभिन्न अभिलेखों और साहित्यिक स्रोतों में सुनारों, लुहारों, बुनकरों तथा व्यापारियों की श्रेणियों का उल्लेख मिलता है।
इन श्रेणियों के प्रमुख को ‘ज्येष्ठक’ कहा जाता था, जो संगठन का संचालन करता था।
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12. निम्न में से शिल्प और शिल्पकारों के बारे में कौन सा कथन असत्य है?
I. उपमहाद्वीप के उत्तरी भागों में मिट्टी के बहुत पतले और सुंदर बर्तन मिले हैं जिन्हें उत्तरी काले चमकीले पात्र कहा जाता है।
II. उत्तर भारत के कपड़ा के महत्वपूर्ण केंद्र मदुरै और दक्षिण में वाराणसी है।
III. शिल्पकार और व्यापारियों के संघ को श्रेणी कहा जाता था।
IV. शिल्पकारों और व्यापारियों के श्रेणियों का कार्य अलग-अलग होता था।
कूट:-
Answer: B
कथन I सही है। उपमहाद्वीप के उत्तरी भागों में मिट्टी के अत्यंत पतले और चमकीले बर्तन मिले हैं, जिन्हें ‘उत्तरी काले चमकीले पात्र’ (Northern Black Polished Ware) कहा जाता है। ये प्राचीन भारतीय शिल्पकला के उत्कृष्ट उदाहरण माने जाते हैं।
कथन II असत्य है क्योंकि वस्त्र उत्पादन के प्रमुख केंद्रों में उत्तर भारत में वाराणसी और दक्षिण भारत में मदुरै प्रसिद्ध थे। प्रश्न में इन दोनों को उल्टा लिखा गया है।
कथन III सही है। शिल्पकारों और व्यापारियों के संगठनों को श्रेणी कहा जाता था। ये संगठन उत्पादन, व्यापार और वितरण का कार्य करते थे।
कथन IV भी सही है क्योंकि शिल्पकारों और व्यापारियों की श्रेणियों के कार्य अलग-अलग होते थे। शिल्पकारों की श्रेणियाँ उत्पादन और प्रशिक्षण से जुड़ी थीं, जबकि व्यापारियों की श्रेणियाँ व्यापार संचालन और विनिमय का कार्य करती थीं।
श्रेणियाँ प्राचीन भारतीय अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं और कई बार बैंक जैसी संस्थाओं के रूप में भी कार्य करती थीं।
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13. उत्तर भारत में कपड़ा का महत्वपूर्ण केंद्र कौन था?
Answer: A
प्राचीन भारत में उत्तर भारत का महत्वपूर्ण वस्त्र उत्पादन केंद्र वाराणसी था। यह नगर कपड़ा उद्योग और व्यापार के लिए प्रसिद्ध था।
वाराणसी में सूती तथा रेशमी वस्त्रों का निर्माण किया जाता था। यहाँ निर्मित वस्त्र दूर-दूर तक व्यापार के माध्यम से पहुँचाए जाते थे।
दक्षिण भारत में मदुरै वस्त्र उत्पादन का प्रमुख केंद्र था। विभिन्न साहित्यिक स्रोतों और पुरातात्त्विक साक्ष्यों से पता चलता है कि प्राचीन काल में वस्त्र उद्योग भारतीय अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण भाग था।
वाराणसी व्यापारिक मार्गों पर स्थित होने के कारण भी आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण नगर बन गया। यहाँ अनेक शिल्पकार, व्यापारी और बुनकर निवास करते थे।
बौद्ध और जैन ग्रंथों में भी वाराणसी के वस्त्र उद्योग का उल्लेख मिलता है।
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14. निम्नलिखित में से सूत काटने और बुनने के नियम के संबंधी कथन पर विचार करें :-
I. ऊन, पेड़ों की छाल, कपास, पटुआ तथा सन को तैयार करने के काम में विधवाओं, वृद्ध वेश्याओं, सेविकाओं और अवकाश प्राप्त देवदासियों को लगाया जाता था।
II. जिन महिलाओं को बाहर जाने की अनुमति नहीं थी वे दासियों को भेजकर कच्चे माल मंगवा सकती थी और उन्हें इनके काम के अनुसार पारिश्रमिक मिलता था।
III. अगर जो महिला अपना पूरा काम नहीं करती थी उन्हें जुर्माना के तौर पर उसके हाथ काट दिए जाते थे।
IV. औरतों द्वारा तैयार माल को जाँचने के लिए रोशनी रहती थी। अगर निरीक्षक उस औरत की तरफ देखता या इधर-उधर की बात करता तो उसे सजा मिलनी चाहिए।
इनमें से सही कथन की पहचान करें:-
Answer: C
यह नियम ‘अर्थशास्त्र’ में वर्णित हैं, जिसकी रचना कौटिल्य (चाणक्य) ने की थी। इसमें बताया गया है कि किस प्रकार राज्य की देखरेख में सूत काटने और बुनाई का कार्य कराया जाता था।
कथन I सही है। ऊन, पेड़ों की छाल, कपास, पटुआ तथा सन से वस्त्र तैयार करने के कार्य में समाज की विभिन्न महिलाओं जैसे विधवाओं, वृद्ध वेश्याओं, सेविकाओं, अवकाशप्राप्त देवदासियों तथा अन्य महिलाओं को लगाया जाता था। इससे राज्य उत्पादन कार्य को बढ़ावा देता था।
कथन II गलत है क्योंकि अर्थशास्त्र में उल्लेख मिलता है कि जिन महिलाओं को बाहर निकलने की अनुमति नहीं थी, वे दासियों के माध्यम से कच्चा माल मंगवा सकती थीं और तैयार माल भिजवा सकती थीं। साथ ही उन्हें उनके कार्य और गुणवत्ता के अनुसार पारिश्रमिक दिया जाता था। प्रश्न में यह कथन अधूरा एवं त्रुटिपूर्ण रूप में दिया गया है।
कथन III सही है। यदि कोई महिला अपना कार्य पूरा नहीं करती थी, तो उसे दंड दिया जाता था। अर्थशास्त्र में कठोर दंड व्यवस्था का उल्लेख मिलता है, यहाँ तक कि अंगूठा काटने जैसी सजा का भी वर्णन मिलता है।
कथन IV भी सही है। तैयार माल की जाँच उचित प्रकाश में की जाती थी। यदि निरीक्षक महिलाओं से अनुचित व्यवहार करता था, उनकी ओर गलत दृष्टि से देखता था या अनावश्यक बातें करता था, तो उसके लिए दंड का प्रावधान था। इससे कार्यस्थल पर अनुशासन बनाए रखने का प्रयास किया जाता था।
अर्थशास्त्र से यह भी जानकारी मिलती है कि मौर्यकाल में राज्य उत्पादन और व्यापार पर कड़ा नियंत्रण रखता था। वस्त्र उद्योग उस समय की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण भाग था।
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15. निम्न में से अरिकामेडु क्या था?
Answer: C
अरिकामेडु प्राचीन भारत का एक महत्वपूर्ण पत्तन (बंदरगाह) था। यह वर्तमान पुडुचेरी (पांडिचेरी) के निकट स्थित था। लगभग 2200 से 1900 वर्ष पहले यह एक प्रमुख व्यापारिक केंद्र के रूप में प्रसिद्ध था।
पुरातात्त्विक उत्खननों से यहाँ रोमन साम्राज्य से जुड़े अनेक अवशेष प्राप्त हुए हैं, जिनमें रोमन सिक्के, काँच के बर्तन, शराब के पात्र तथा मनके शामिल हैं। इससे पता चलता है कि भारत का रोम सहित पश्चिमी देशों से समुद्री व्यापार होता था।
अरिकामेडु से मसाले, कपड़े, मोती और कीमती पत्थरों का निर्यात किया जाता था, जबकि विदेशी वस्तुएँ यहाँ आयात होती थीं। यह बंदरगाह दक्षिण भारत के अंतरराष्ट्रीय व्यापार का महत्वपूर्ण केंद्र था।
यहाँ से प्राप्त ‘एम्फोरा’ नामक बड़े मृदभांड इस बात के प्रमाण हैं कि रोमन व्यापारी समुद्री मार्ग से भारत आते थे।
अरिकामेडु भारतीय उपमहाद्वीप और भूमध्यसागरीय देशों के बीच व्यापारिक संबंधों का महत्वपूर्ण साक्ष्य माना जाता है।
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16. बेरिगाजा (भड़ौच) क्या था?
Answer: D
बेरिगाजा प्राचीन भारत के प्रसिद्ध बंदरगाह भड़ौच (वर्तमान भरूच, गुजरात) का यूनानी नाम था। यह पश्चिमी भारत का एक महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक केंद्र था।
एक यूनानी नाविक द्वारा लिखित विवरण ‘पेरिप्लस ऑफ द एरिथ्रियन सी’ में बेरिगाजा का उल्लेख मिलता है। इसमें बताया गया है कि इस बंदरगाह तक पहुँचना आसान नहीं था क्योंकि इसकी खाड़ी संकरी थी और समुद्री धाराएँ तेज थीं।
बेरिगाजा से कपड़ा, मसाले, हाथीदांत, कीमती पत्थर तथा अन्य वस्तुओं का व्यापार किया जाता था। यहाँ विदेशी व्यापारी भी आते थे।
यह बंदरगाह भारत और रोमन साम्राज्य के बीच समुद्री व्यापार का प्रमुख केंद्र था। यहाँ से पश्चिम एशिया और भूमध्यसागर के देशों तक व्यापारिक संपर्क स्थापित थे।
भड़ौच नर्मदा नदी के मुहाने पर स्थित होने के कारण व्यापारिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बन गया था। नदी और समुद्री मार्ग दोनों उपलब्ध होने से यहाँ व्यापार तेजी से विकसित हुआ।
प्राचीन भारतीय समुद्री व्यापार में बेरिगाजा, अरिकामेडु और मुजिरिस जैसे बंदरगाहों की महत्वपूर्ण भूमिका थी।
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17. निम्नलिखित में से बेरिगाजा के संदर्भ में असत्य कथन चुने?
I. बेरिगाजा एक समुद्री जहाज था।
II. बेरिगाजा में शराब, तांबा, टिन, सीसा, मूंगा, पुखराज, सोने और चाँदी के सिक्कों का आयात होता था।
III. हिमालय से जड़ी-बूटियाँ, हाथी-दाँत, गोमेद, सूती कपड़ा, रेशम तथा इत्र यहाँ से निर्यात किया जाता था।
IV. राजा के लिए व्यापारी चाँदी के बर्तन, गायक किशोर, सुंदर औरतें, अच्छी शराब आदि उपहार के तौर पर लाते थे।
कूट:-
Answer: B
कथन I असत्य है क्योंकि बेरिगाजा कोई समुद्री जहाज नहीं था, बल्कि प्राचीन भारत का एक प्रसिद्ध बंदरगाह (भड़ौच) था। यह वर्तमान गुजरात राज्य में नर्मदा नदी के मुहाने पर स्थित था। यूनानी ग्रंथों में भड़ौच को “Barygaza” कहा गया है।
कथन II सत्य है। बेरिगाजा में विदेशों से शराब, तांबा, टिन, सीसा, मूंगा, पुखराज, कपड़े तथा सोने-चाँदी के सिक्कों का आयात किया जाता था। इससे स्पष्ट होता है कि यह अंतरराष्ट्रीय व्यापार का प्रमुख केंद्र था।
कथन III भी सत्य है। यहाँ से हिमालय की जड़ी-बूटियाँ, हाथी-दाँत, गोमेद, कार्नीलियन, सूती वस्त्र, रेशम तथा इत्र का निर्यात होता था। भारतीय वस्तुओं की विदेशी बाजारों में बहुत माँग थी।
कथन IV भी सत्य है। विदेशी व्यापारी राजा के लिए विशेष उपहार लाते थे, जिनमें चाँदी के बर्तन, उत्तम शराब, सुंदर वस्त्र, गायक किशोर तथा सुंदर महिलाएँ शामिल थीं। इससे तत्कालीन शाही वैभव और विदेशी संपर्कों का पता चलता है।
बेरिगाजा के बारे में जानकारी मुख्यतः यूनानी नाविकों द्वारा लिखे गए ग्रंथ Periplus of the Erythraean Sea से मिलती है। यह ग्रंथ प्राचीन भारतीय समुद्री व्यापार का महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है।
अतिरिक्त तथ्य:
भड़ौच (बेरिगाजा) पश्चिमी भारत का सबसे व्यस्त बंदरगाहों में से एक था। यहाँ से रोमन साम्राज्य के साथ बड़े पैमाने पर व्यापार होता था।
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18. निम्न में से बेरिगाजा से निर्यात होने वाली वस्तुएँ कौन सी है?
Answer: B
बेरिगाजा से हाथी-दाँत का निर्यात किया जाता था। यह प्राचीन भारत का महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र था जहाँ से अनेक बहुमूल्य वस्तुएँ विदेशों में भेजी जाती थीं।
हाथी-दाँत के अलावा यहाँ से हिमालय की जड़ी-बूटियाँ, गोमेद, कार्नीलियन, सूती कपड़े, रेशम तथा इत्र का भी निर्यात होता था। भारतीय शिल्प और वस्त्र विदेशी व्यापारियों में अत्यंत लोकप्रिय थे।
वहीं शराब, तांबा, टिन, सीसा, मूंगा, पुखराज तथा सोने-चाँदी के सिक्कों का आयात विदेशों से किया जाता था। इसलिए विकल्प (A), (C) और (D) आयातित वस्तुएँ थीं, निर्यातित नहीं।
प्राचीन भारत में समुद्री व्यापार के कारण पश्चिमी तट के बंदरगाह अत्यंत समृद्ध हो गए थे। बेरिगाजा उनमें सबसे महत्वपूर्ण केंद्रों में से एक था।
अतिरिक्त तथ्य:
कार्नीलियन नामक लाल रंग का बहुमूल्य पत्थर गुजरात क्षेत्र में तैयार किया जाता था और इसकी विदेशों में बहुत माँग थी।
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19. बेरिगाजा से आयात होने वाली वस्तुएँ कौन सी है?
Answer: D
बेरिगाजा में विदेशों से अनेक वस्तुओं का आयात किया जाता था। इनमें शराब, तांबा, टिन, सीसा, मूंगा, पुखराज, कपड़े तथा सोने और चाँदी के सिक्के प्रमुख थे। इसलिए दिए गए सभी विकल्प सही हैं।
विदेशी व्यापारी समुद्री मार्ग से इन वस्तुओं को भारत लाते थे। बदले में भारतीय व्यापारी सूती वस्त्र, हाथी-दाँत, मसाले, इत्र तथा कीमती पत्थरों का निर्यात करते थे।
सोने और चाँदी के सिक्कों का आयात इस बात का प्रमाण है कि भारत का व्यापार संतुलन मजबूत था और विदेशी व्यापारी भारतीय वस्तुओं के बदले बहुमूल्य धातुएँ देते थे।
मूंगा और शराब जैसी वस्तुएँ रोमन साम्राज्य से लाई जाती थीं। इससे भारत और रोम के बीच घनिष्ठ व्यापारिक संबंधों का पता चलता है।
अतिरिक्त तथ्य:
रोमन लेखक प्लिनी ने लिखा था कि भारत के साथ व्यापार के कारण रोम से बहुत अधिक सोना बाहर जा रहा था।
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20. निम्नलिखित में सही कथन का चयन करें:
I. दक्षिण भारत सोना, मसाले, खास तौर पर काली मिर्च, और कीमती पत्थरों के लिए प्रसिद्ध है।
II. काली मिर्च की रोमन साम्राज्य में इतनी मांग थी कि इसे ‘काले सोने’ के नाम से जाने लगा।
कूट:-
Answer: C
दोनों कथन सही हैं। लगभग 2000 से 2300 वर्ष पहले दक्षिण भारत व्यापार और समुद्री गतिविधियों का एक अत्यंत महत्वपूर्ण केंद्र था। यहाँ से सोना, मसाले, विशेष रूप से काली मिर्च, तथा बहुमूल्य पत्थरों का व्यापार दूर-दूर के देशों तक किया जाता था।
दक्षिण भारत के चेर, चोल और पांड्य राज्यों के समुद्री संपर्क पश्चिम एशिया और रोमन साम्राज्य तक फैले हुए थे। व्यापारी समुद्री जहाजों के माध्यम से इन वस्तुओं को विदेशी बाजारों तक पहुँचाते थे।
काली मिर्च की रोमन साम्राज्य में इतनी अधिक माँग थी कि इसे “काला सोना” कहा जाने लगा। रोमन लोग भारतीय मसालों को बहुत मूल्यवान मानते थे। काली मिर्च केवल भोजन का स्वाद बढ़ाने के लिए ही नहीं, बल्कि औषधि के रूप में भी उपयोग की जाती थी।
दक्षिण भारत के बंदरगाहों से मसाले, हाथी-दाँत, सूती वस्त्र, रेशम तथा कीमती पत्थरों का निर्यात होता था। बदले में रोमन व्यापारी सोना, चाँदी, शराब और अन्य विलासिता की वस्तुएँ भारत लाते थे।
समुद्री व्यापार से दक्षिण भारतीय राज्यों की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत हुई। बंदरगाह नगरों का विकास हुआ और व्यापारियों की समृद्धि बढ़ी। रोमन साम्राज्य के अनेक स्वर्ण सिक्के दक्षिण भारत में मिले हैं, जो भारत और रोमन साम्राज्य के बीच गहरे व्यापारिक संबंधों का प्रमाण हैं।
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21. तमिल शब्द ‘मुवेंदर’ का क्या अर्थ है?
Answer: A
‘मुवेंदर’ एक प्राचीन तमिल शब्द है, जिसका अर्थ “तीन मुखिया” होता है। संगम साहित्य में इस शब्द का उपयोग दक्षिण भारत के तीन प्रमुख शासक परिवारों — चोल, चेर और पांड्य — के लिए किया गया है।
लगभग 2300 वर्ष पहले ये तीनों राजवंश दक्षिण भारत के सबसे शक्तिशाली राजनीतिक केंद्र माने जाते थे। इनका शासन क्षेत्र व्यापक था और ये समुद्री व्यापार, कृषि तथा सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए प्रसिद्ध थे।
चोल राज्य कावेरी नदी के उपजाऊ मैदानों में स्थित था। चेर राज्य पश्चिमी तट पर स्थित था और मसालों, विशेषकर काली मिर्च, के व्यापार के लिए प्रसिद्ध था। पांड्य राज्य की राजधानी मदुरै थी, जो शिक्षा, साहित्य और व्यापार का महत्वपूर्ण केंद्र था।
संगम साहित्य से हमें इन शासकों के राजनीतिक जीवन, युद्ध, व्यापार, समाज और संस्कृति के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है।
इन तीनों राज्यों के अलग-अलग सत्ता केंद्र थे। कुछ तटीय क्षेत्रों में स्थित थे जबकि कुछ आंतरिक भागों में। समुद्री व्यापार इनके आर्थिक विकास का प्रमुख आधार था। संगम सभाओं में तमिल कवियों और विद्वानों की रचनाओं का संकलन किया जाता था, जिन्हें आज “संगम साहित्य” कहा जाता है।
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22. 2300 साल पहले दक्षिण भारत का सबसे शक्तिशाली राज्य कौन था?
Answer: D
लगभग 2300 वर्ष पहले दक्षिण भारत में चोल, चेर और पांड्य — तीनों ही शक्तिशाली राज्य थे। इसलिए सही उत्तर “सभी” है।
इन तीनों शासक परिवारों को सामूहिक रूप से “मुवेंदर” कहा जाता था। संगम साहित्य में इनके शासन, युद्ध, व्यापार और सामाजिक जीवन का विस्तृत वर्णन मिलता है।
चोल राज्य कृषि और समुद्री व्यापार के लिए प्रसिद्ध था। इसकी राजधानी उरैयूर तथा प्रमुख बंदरगाह पुहार (कावेरीपत्तनम) था। कावेरी नदी का उपजाऊ मैदान इसकी आर्थिक शक्ति का मुख्य आधार था।
चेर राज्य पश्चिमी तट पर स्थित था। यह काली मिर्च और अन्य मसालों के व्यापार के लिए प्रसिद्ध था। विदेशी व्यापारी यहाँ से मसाले खरीदकर रोमन साम्राज्य तक ले जाते थे।
पांड्य राज्य दक्षिणी तमिल क्षेत्र में स्थित था। इसकी राजधानी मदुरै थी, जो संगम साहित्य और सांस्कृतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र थी। मोती व्यापार के कारण यह राज्य भी अत्यंत समृद्ध था।
तीनों राज्यों के समुद्री संबंध विदेशी देशों से थे। व्यापार के माध्यम से इन्हें सोना, चाँदी तथा अन्य बहुमूल्य वस्तुएँ प्राप्त होती थीं। मदुरै में आयोजित संगम सभाएँ तमिल साहित्य के विकास का महत्वपूर्ण केंद्र थीं।
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23. निम्नलिखित में से दक्षिण भारत के राज्यों के संदर्भ में सही कथन को चुने:-
Answer: C
दिया गया सही उत्तर पुस्तक के अनुसार विकल्प (C) है। दक्षिण भारत के मुखिया लोगों से केवल उपहार नहीं लेते थे, बल्कि नियमित रूप से कर भी वसूलते थे। इससे राज्य की आय व्यवस्थित रूप से प्राप्त होती थी और शासन व्यवस्था को चलाने में सहायता मिलती थी।
संगम साहित्य में चोल, चेर और पांड्य राज्यों का उल्लेख मिलता है। ये दक्षिण भारत के प्रमुख और शक्तिशाली शासक परिवार थे। इनके अलग-अलग सत्ता केंद्र थे, जिनमें कुछ तटीय क्षेत्रों में और कुछ आंतरिक भागों में स्थित थे।
चोलों का प्रसिद्ध बंदरगाह पुहार या कावेरीपत्तनम था। यह समुद्री व्यापार का एक बड़ा केंद्र था। यहाँ विदेशी व्यापारी भी आते थे। पांड्य राज्य की राजधानी मदुरै थी, जो साहित्य, व्यापार और सांस्कृतिक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता था।
दक्षिण भारत में कावेरी नदी का मैदान अत्यंत उपजाऊ था। यहाँ कृषि उत्पादन अधिक मात्रा में होता था, जिससे चोल राज्य की आर्थिक स्थिति मजबूत बनी।
इन राज्यों की समृद्धि का एक प्रमुख कारण समुद्री व्यापार था। दक्षिण भारत से मसाले, मोती, हाथी-दाँत और वस्त्र विदेशों तक निर्यात किए जाते थे।
संगम साहित्य में यह भी उल्लेख मिलता है कि मुखिया अपने लोगों से उपहार, कर तथा युद्ध में प्राप्त धन के माध्यम से संसाधन एकत्रित करते थे। पुहार प्राचीन भारत के सबसे प्रसिद्ध बंदरगाह नगरों में से एक था और इसे कावेरीपत्तनम के नाम से भी जाना जाता था।
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24. सातवाहन वंश के सबसे महान शासक कौन थे?
Answer: B
सातवाहन वंश का सबसे प्रमुख और महान शासक गौतमीपुत्र शातकर्णि था। लगभग 2000 वर्ष पहले पश्चिमी और दक्षिण भारत में सातवाहन राजवंश का प्रभाव बढ़ा। गौतमीपुत्र शातकर्णि ने इस वंश की शक्ति को संगठित और मजबूत बनाया।
उसके बारे में जानकारी उसकी माता गौतमी बालश्री द्वारा कराए गए अभिलेखों से प्राप्त होती है। इन अभिलेखों में उसे एक शक्तिशाली और विजयी शासक बताया गया है। वह “दक्षिणापथपति” अर्थात दक्षिणापथ का स्वामी कहलाता था।
गौतमीपुत्र शातकर्णि ने पश्चिमी भारत के अनेक क्षेत्रों पर विजय प्राप्त की और विदेशी शक शासकों की शक्ति को कमजोर किया। उसके शासनकाल में व्यापार, प्रशासन तथा कृषि व्यवस्था का विकास हुआ।
सातवाहन शासकों ने दक्कन क्षेत्र में व्यापारिक मार्गों को सुरक्षित रखा। इनके राज्य से होकर उत्तर और दक्षिण भारत को जोड़ने वाले महत्वपूर्ण व्यापार मार्ग गुजरते थे। इसी कारण व्यापार और शिल्प का विकास हुआ।
सातवाहन काल में प्राकृत भाषा का व्यापक उपयोग हुआ तथा बौद्ध धर्म को भी संरक्षण मिला। नासिक और कार्ले की गुफाएँ सातवाहन कालीन कला और स्थापत्य के महत्वपूर्ण उदाहरण हैं।
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25. सिल्क रूट पर नियंत्रण रखने वाले शासकों में सबसे प्रसिद्ध ______ थे?
Answer: D
सिल्क रूट पर नियंत्रण रखने वाले शासकों में सबसे प्रसिद्ध कुषाण थे। लगभग 2000 वर्ष पहले मध्य एशिया तथा उत्तर-पश्चिम भारत में कुषाण साम्राज्य का विस्तार था।
कुषाणों के दो प्रमुख शक्ति केंद्र पेशावर और मथुरा थे। तक्षशिला भी उनके राज्य का महत्वपूर्ण भाग था। उनके शासनकाल में सिल्क रूट की एक प्रमुख शाखा मध्य एशिया से होकर सिंधु नदी के मुहाने तक जाती थी। वहाँ से समुद्री जहाजों द्वारा रेशम और अन्य वस्तुएँ पश्चिमी देशों तथा रोमन साम्राज्य तक पहुँचाई जाती थीं।
सिल्क रूट एशिया और यूरोप को जोड़ने वाला एक महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्ग था। इस मार्ग से रेशम, मसाले, घोड़े, बहुमूल्य पत्थर और अन्य विलासिता की वस्तुओं का व्यापार होता था। चीन का रेशम विश्वभर में अत्यंत प्रसिद्ध था और इसकी सबसे अधिक माँग रोमन साम्राज्य में थी।
कुषाण शासकों ने व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया। इससे व्यापारियों को सुरक्षित यात्रा करने में सुविधा हुई और अंतरराष्ट्रीय व्यापार तेजी से बढ़ा। व्यापार से कुषाण साम्राज्य बहुत समृद्ध हुआ।
कुषाण शासक कनिष्क विशेष रूप से प्रसिद्ध था। उसके समय में बौद्ध धर्म का व्यापक प्रचार-प्रसार हुआ। उसने बौद्ध धर्म की चौथी संगीति का आयोजन कराया और गांधार कला को संरक्षण दिया।
कुषाण काल में भारत, चीन, मध्य एशिया और रोमन साम्राज्य के बीच सांस्कृतिक तथा आर्थिक संपर्क मजबूत हुए। इस काल में बड़ी संख्या में स्वर्ण मुद्राएँ जारी की गईं, जो उनकी आर्थिक समृद्धि का प्रमाण हैं।
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